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Updated: 10 hours 37 min ago

मटर की खेती

Tue, 05/08/2018 - 14:18

 

मटर की उन्नत खेती 

 

शीतकालीन सब्जियो मे मटर का स्थान प्रमुख है। इसकी खेती हरी फल्ली (सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया जाता है।  मटर की खेती सब्जी और दाल के लिये उगाई जाती है। मटर दाल की आवश्यकता की पूर्ति के लिये पीले मटर का उत्पादन करना अति महत्वपूर्ण है, जिसका प्रयोग दाल, बेसन एवं छोले के रूप में अधिक किया जाता है ।आजकल मटर की डिब्बा बंदी भी काफी लोकप्रिय है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है। देश भर मे इसकी खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है।

जलवायु

 

मटर की फसल के लिए नम और ठंडी जुलाई की आवश्यकता होती है अत: हमारे देश में अधिकांश स्थानों पर मटर की फसल रबी  की ऋतु में गई जाती है  इसकी बीज अंकुरण के लिये औसत 22 डिग्री सेल्सियस एवं अच्छी वृद्धि एवं विकास के लिये 10-18 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। यदि फलियो के निर्माण के समय गर्म या शुष्क मौसम हो जाये तो मटर के गुणो एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।उन सभी स्थानों पर जहां वार्षिक वर्षा 60-80 से.मी. तक होती है मटर की फसल सफलता पूर्वक उगाई जा सकती है मटर के वृद्धि काल में अधिक वर्षा का होना अत्यंत हानिकारक होता है

 Submi(सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया जाता है।  मटर की खेती सब्जी और दाल के लिये उगाई जाती है। मटर दाल की आवश्यकता की पूर्ति के लिये पीले मटर का उत्पादन करना अति महत्वपूर्ण है, जिसका प्रयोग दाल, बेसन एवं छोले के रूप में अधिक किया जाता है ।आजकल मटर की डिब्बा बंदी भी काफी लोकप्रिय है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है। देश भर मे इसकी खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है।

 

भूमि 

इसकी सफल खेती के लिये उचित जल निकास क्षमता वाली, जीवांश पदार्थ मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जिसका पी.एच.मान. 6-7.5 हो तो अधिक उपयुक्त होती है।मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अति उत्तम है बलुअर दोमट भूमियों में भी सिचाई की सुबिधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है कछार क्षेत्रों की भूमियाँ भी पानी सूख जाने के पश्चात् भी मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है  |

प्रजातियाँ 

 

 

फील्ड मटर

 

 इस वर्ग के किस्मो का उपयोग साबुत मटर, दाल के लिये, दाने एवं चारे के लिये किया जाता है। इन किस्मो मे प्रमुख रूप से रचना, स्वर्णरेखा, अपर्णा, हंस, जे.पी.-885, विकास, शुभा्र, पारस, अंबिका आदि है।

गार्डन मटर

 

 इस वर्ग के किस्मो का उपयोग सब्जियो के लिये किया जाता है। 

अगेती किस्मे (जल्दी तैयार होने वाली)

आर्केल 
यह यूरोपियन अगेती किस्म है इसके दाने मीठे होते है इसमें बुवाई के ५५-६५ दिन बाद फलियाँ तोड़ने योग्य हो जाती है इसकी फलियाँ ८-१० से.मी. लम्बी एक समान होती है प्रत्येक फली में ५-६ दाने होते है हरी फलियों की ७०-१०० क्विंटल उपज मिल जाती है इसकी फलियाँ तीन बार तोड़ी जा सकती है इसका बीज झुर्री दार होता है |
बोनविले 
यह जाति अमेरिका से लाई गई है इसका बीज झुर्री दार होता है यह मध्यम उचाई की सीधे उगने वाली जाति है यह मध्यम समय में तैयार होने वाली जाति है इसकी फलियाँ बोवाई के ८०-८५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है फूल की शाखा पर दो फलियाँ लगती है इसकी फलियों की औसत पैदावार १३०-१४० क्विंटल प्रति हे. तक प्राप्त होती है |
अर्ली बैजर
यह किस्म संयुक्त राज्य अमेरिका से लाई गई है यह अगेती किस्म है बुवाई के ६५-७० दिन बाद इसकी फलियाँ तोड़ने केलिए तैयार हो जाती है फलियाँ हलके हरे रंग की लगभग ७ से.मी. लम्बी तथा मोटी होती है दाने आकार में बड़े ,  मीठे व झुर्रीदार होते है हरी फलियों की औसत उपज ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. होती है |
अर्ली दिसंबर
टा. १९ व अर्ली बैजर के संस्करण से तैयार की गई है यह अगेती किस्म है ५५-६० में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है फलियों की लम्बाई ६-७ से.मी. व रंग गहरा हरा होता है हरी फलियों की औसत उपज ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. हो जाती है |
असौजी
यह एक अगेती बौनी किस्म है इसकी फलियाँ बोवाई के ५५-६५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है इसकी फलियाँ गहरे हरे रंग की ५-६ से. मी. लम्बी व दोनों सिरे से नुकीली , लम्बी होती है प्रत्येक फली में ५-६ दाने होते है हरी फलियों की औसत उपज ९०-१०० क्विंटल प्रति हे. होती है |
पन्त उपहार
इसकी बुवाई २५ अक्टूम्बर से १५ नवम्बर तक की जाती है और इसकी फलियाँ बुवाई से ६५-७५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है |
जवाहर मटर 
 इसकी फलियाँ बुवाई से ६५-७५ दिन बाद तोड़ने योग्य हो जाती है यह मध्यम किस्म है फलियों की औसत लम्बाई ७-८ से. मी. होती है और प्रत्येक फली में ५-८ बीज होते है फलियों में दाने ठोस रूप में भरे होते है हरी फलियों की औसत पैदावार १३०-१४० क्विंटल प्रति हे. होती है |
मध्यम किस्मे
T9
यह भी मध्यम किस्म है इसकी फलियाँ ७५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है फसल अवधि १२० दिन है पौधों का रंग गहरा हरा फूल सफ़ेद व बीज झुर्रीदार व हल्का हरापन लिए हुए सफ़ेद होते है फलियों की पैदावार ८०-१०० क्विंटल प्रति हे. पैदावार होती है |
T56
यह भी मध्यम अवधि की किस्म है पौधे हलके हरे , सफ़ेद बीज झुर्रेदार होते है हरी फलियाँ ७५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है प्रति हे. ८०-९० क्विंटल हरी फलियाँ प्राप्त हो जाती है |
NP29
यह भी अगेती किस्म है फलियाँ ७५-८५ दिन में तोड़ने लायक हो जाती है इसकी फसल अवधि १००-११० दिन है बीज झुर्रीदार होते है हरी फलियों की औसत पैदावार १००-१२० क्विंटल प्रति हे. है |
पछेती किस्मे (देरी से तैयार होने वाली):- ये किस्मे बोने के लगभग 100-110 दिनो बाद पहली तुड़ाई करने योग्य हो जाती है जैसे- आजाद मटर-2, जवाहर मटर-2 आदि।      

बीज 

 अगेती किस्मो के लिये 100 कि.ग्रा. एवं मध्यम व पछेती किस्मो के लिये 80 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर लगता है। बीज सदैव प्रमाणित एवं उपचारित बोना चाहिए बीज को बोने से पहले नीम का तेल या गौमूत्र या कैरोसिन से उपचारित कर बुवाई करें |
बीज एवं अंतरण :-
प्राय: मटर शुद्ध फसल या मिश्रित के रूप में ली जाती है  इसकी बुंवाई हल के पीछे कूड़ो मे या सीड ड्रील द्वारा की जाती है। बुबाई के समय  ३०-४५ से.मी पंक्ति से पंक्ति तथा १०-१५ से.मी. पौध से पौध की दूरी तथा  ५-७ से.मी. गहराई पर बोते है |
बोने का समय 
 उत्तरी भारत में दाल वाली में मटर की बुवाई का उत्तम समय १५-३० अक्टूम्बर तक है  फलियों सब्जी के लिए बुवाई २० अक्टूम्बर से १५ नवम्बर तक करना लाभदायक है |

 

खाद एवं उर्वरक

मटर की फसल में अच्छी तरह से पैदावार लेने के लिए एक एकड़  भूमि में 10-15  क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद और नीम की खली को खेत में समान रूप से बखेर कर जुताई के समय मिला देना चाहिए ट्राईकोडरमा 25 किलो एकड़ के अनुपात से खेत में मिलाना चाहिए लेकिन याद रहे कि खेत में पर्याप्त नमी हो बुबाई के 15-20 दिन बाद वर्मिवाश  का अच्छी तरह से छिड्काब करें ताकि पोधा तर बतर हो जाये निराई के बाद जीवामृत का छिड्काब कर दें  फूल आनें के समय नीम और करंज को गोमूत्र में मिलाकर छिद्काब कर दें 
जब फसल फूल पर हो या समय हो रहा हो तो एमिनो असिड एवं पोटाशियम होमोनेट की मात्रा स्प्रे के द्वारा देनी चाहिए 15 दिनों के बाद एमिनो असिड पोटाशियम होमोनेट फोल्विक एसिड को मिला कर छिडक देना चाहिए नमी बनी रहे इसका ध्यान रखें 
यदि रासायनिक खाद का प्रयोग करते है तो  गोबर या कम्पोस्ट खाद (10-15 टन/हे.) खेत की तैयारी के समय देवें। चूंकि यह दलहनी फसल है इसलिये इसका जड़ नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य करता है अतः फसल को कम नाइट्रोजन देने की आवश्यकता पड़ती है। रासायनिक खाद के रूप मे 20-25 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40-50 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस एवं 40-50 कि.ग्रा. पोटाश/हे. बीज बुंवाई के समय ही कतारों में दिया जाना चाहिये। यदि किसान उर्वरको की इस मात्रा को यूरिया, सिंगल सुपर फाॅस्फेट एवं म्यूरेट आफ पोटाश के माध्यम से देना चाहता है तो 1 बोरी यूरिया, 5 बोरी सिंगल सुपर फास्फेट एवं 1.5 बोरी म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।
सिचाई 
मटर की देशी व उन्नत शील जातियों में दो सिचाई की आवश्यकता पड़ती है शीतकालीन वर्षा हो जाने पर दूसरी सिचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती पहली सिचाई फूल निकलते समय बोने के ४५ दिन बाद व दूसरी सिचाई आवश्यकता पड़ने पर फली बनते समय बीज बोने के ६० दिन बाद करें साधारणतया मटर को हल्के  पानी की आवश्यकता होती है सिचाई सदैव हलकी करनी चाहिए |

खरपतवार 

मटर की फसल के प्रमुख खरपतवार है - बथुआ , गजरी, चटरी-मटरी , सैजी , अंकारी  इन सब खरपतवारों को निराई-गुड़ाई करके फसल से बाहर निकाला जा सकता है। फसल बोने के ३५-४० दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना आवश्यक है आवश्यकतानुसार एक या दो निराई बोने के ३०-३५ दिन बाद करनी चाहिए |
कीट नियंत्रण
तना छेदक 
यह काले रंग की मक्खी होती है इसकी गिडारें फसल की प्रारंभिक अवस्था  में छेद कर अन्दर से खाती है जिसमे पौधे सूख जाते है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
पत्ती में सुरंग बनाने वाले कीट 
इस कीट का आक्रमण पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही शुरू हो जाता है इसकी गिडारे पत्तियों में ही सुरंग बनाकर कोशिकाओं को खा जाती है यह सुरंग पत्तियों पर दिखाई देती है |
रोकथाम
४०-50 दिन पुराना 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
फली छेदक 
देर से बोई गई फसल में इस कीट का आक्रमण अधिक होता है इस कीट की सुंडियां फली में छेद करके उनके अन्दर तक पूर्णतया प्रवेश कर जाती है और दोनों को खाती रहती है |
 रोकथाम 
मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लीटर गोमूत्र में उबालें। 7.5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
माहू 
इस कीट का प्रकोप जनवरी के बाद प्राय: होता है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
रोग नियंत्रण 
बुकनी 
इसे चित्ती या चूर्णी रोग कहते है पतियाँ , फलियाँ तथा तने पर सफ़ेद चूर्ण सा फैलता है और बाद में पत्तियां आदि काली होकर मरने लगती है |
रोकथाम 
10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर छिड़काव करें  |
उकठा
इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में पौधों की पत्तियां नीचे से ऊपर की ओर पीली पड़ने लगती है और पूरा पौधा सूख जाता है यह बीज जनित रोग है फलियाँ बनती नहीं है |
रोकथाम 
जिस खेत एक बार मटर में इस बीमारी का प्रकोप हुआ हो उस खेत में ३-४ वर्षों तक यह फसल नहीं बोना चाहिए और तंबाकू की 2.5 किलोग्राम पत्तियां ढार्इ किलो आक या आँकड़ा तथा  5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों  को 10 लीटर गोमूत्र में उबालें और 5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |
तुलासिता 
इस रोग में पत्तियों की उपरी सतह पर प्रारंभिक अवस्था में पीले रंग के धब्बे दिखाई देते है जिसके नीचे सफ़ेद रुई के समान फफूंदी की वृद्धि दिखाई देती है |
रोकथाम :
इसकी रोकथाम के लिए 10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें फिर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें

 
सफ़ेद विगलन 

यह रोग पर्वतीय क्षेत्र में व्यापक रूप से फैलता है इस रोग से पौधों के सभी वायवीय भाग रोग से ग्रसित हो जाते है जिससे पूरा पौधा सफ़ेद रंग का होकर मर जाता है पौधे के रोग ग्रस्त भागों पर सफ़ेद रंग की फफूंदी उग जाती है और बाद में रोग ग्रस्त भागों में ऊपर तथा अन्दर काले रंग के गोल दाने बन जाते है |
रोकथाम 
फसल की बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह से पहले नहीं करनी चाहिए , जिस खेत में इस रोग का प्रकोप पिछले सालों अधिक देखने को मिला हो उसमे कम से कम 5 वर्षों

इसकी सफल खेती के लिये उचित जल निकास क्षमता वाली, जीवांश पदार्थ मृदा उपयुक्त मानी जाती है। जिसका पी.एच.मान. 6-7.5 हो तो अधिक उपयुक्त होती है।मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अति उत्तम है बलुअर दोमट भूमियों में भी सिचाई की सुबिधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है कछार क्षेत्रों की भूमियाँ भी पानी सूख जाने के पश्चात् भी मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है  |

 

 

 

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पालक की खेती

Tue, 05/08/2018 - 14:07

 पालक की उन्नत खेती कैसे करें

पत्तियों वाली सब्जियों में पालक भी एक भारतीय सब्जी है जिसकी खेती अधिक क्षेत्र में की जाती है । यह हरी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है । इसकी पत्तियां स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभकारी हैं । इसकी खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है । यह सब्जी विलायती पालक की तरह पैदा की जाती है ।

पालक एक खनिज पदार्थ युक्त एवं विटामिन्स युक्त वाली फसल है जिसका कि प्रत्येक मनुष्य को साधारण प्रयोग करना चाहिए । यहां तक कि 100-125 ग्राम पालक रोज दैनिक जीवन के लिये संतुलित आहार के रूप में खाने की सिफारिश की जाती है । अन्यथा पत्ती वाली सब्जी अवश्य प्रतिदिन खानी चाहिए । इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के अतिरिक्त नमकीन पकौड़े, आलू मिलाकर तथा भूजी बनाकर किया जाता है । पालक के सेवन से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है । अधिक मात्रा में प्रोटीन, कैलोरीज, खनिज, कैल्शियम तथा विटामिन्स ए, सी का एक मुख्य साधन है जो कि दैनिक जीवन के लिए अति आवश्यक है ।

 

पालक की खेती के लिये आवश्यक भूमि व जलवायु 

पालक की खेती के लिये ठन्डे मौसम की जलवायु की आवश्यकता होती है । यह फसल जाड़े में होती है । पालक के लिये अधिक तापमान की आवश्यकता नहीं होती लेकिन कुछ जगह पर वसन्त ऋतु के आसपास पैदा करते हैं अर्थात् जायद की फसल के साथ पैदा करते हैं । पालक जनवरी-फरवरी में अधिक वृद्धि करता है ।

 

पालक की खेती के लिये खेत की तैयारी 

 

पालक की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में पैदा की जा सकती है लेकिन सबसे उत्तम भूमि बलुई दोमट होती है । पालक का हल्का अम्लीय भूमि में भी उत्पादन किया जा सकता है । उर्वरा शक्ति वाली भूमि में बहुत अधिक उत्पादन किया जा सकता है । पालक के खेत में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए । भूमि का पी. एच. मान 6.0 से 6.7 के बीच का अच्छा होता है ।

पालक के खेत की 3-4 बार जुताई करके खेत तैयार करना चाहिए । जुताई के समय हरी या सूखी घास को खेत से बाहर निकाल कर जला देना चाहिए । इस प्रकार से खेत को अच्छी तरह तैयार व साफ करके मिट्‌टी को भुरभुरा करना चाहिए तथा बाद में खेत में क्यारियां तैयार कर लेनी चाहिए । खेत में खाद आदि डालकर मिट्‌टी में भली-भांति मिला देना चाहिए ।

इसे भी पढ़ें -> विलायती पालक की खेती कैसे करें

 

गोबर की खाद एवं रासायनिक खादों का प्रयोग 

 

पालक की फसल के लिये 18-20 ट्रौली गोबर की खाद तथा 100 किलो D.A.P. प्रति हेक्टर की दर से बुवाई से पहले खेत तैयार करते समय मिट्‌टी में मिलाना चाहिए तथा पहली कटाई के बाद व अन्य कटाई के बाद 20-25 किलो यूरिया प्रति हेक्टर देने से फसल की पैदावार अधिक मिलती है । इस प्रकार से वृद्धि शीघ्र होती है ।

बगीचे की यह एक मुख्य फसल है । पालक को बोने के लिये खेत को ठीक प्रकार से तैयार करके बोना चाहिए । खेत को तैयार करते समय 4-5 टोकरी गोबर की खाद सड़ी हुई या डाई अमोनियम फास्फेट 500 ग्राम 8-10 वर्ग मी. के लिये लेकर मिट्‌टी में बुवाई से पहले मिला देते हैं । बाद में फसल को बढ़ने के पश्चात् काटते हैं तो प्रत्येक कटाई के बाद 100 ग्राम यूरिया उपरोक्त क्षेत्र में छिड़कना चाहिए जिससे पत्तियों की वृद्धि शीघ्र होती है तथा सब्जी के लिये पत्तियां जल्दी-जल्दी मिलती रहती हैं ।

 

पालक की उन्नतशील जातिया

 

पालक की कुछ मुख्य जातियां हैं जिनको भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बोने की सिफारिश की जाती है, वे निम्नलिखित हैं-

1. पालक ऑल ग्रीन (Palak All Green)– इस किस्म से एक साथ हरी पत्तियां प्राप्त होती हैं । पत्तियां 40 दिन में तैयार हो जाती है । पत्तियां छोटी-बड़ी न होकर एक-सी होती हैं । वृद्धि काल-अन्तिम सितम्बर से जनवरी आरम्भ का समय होता है । इसे 5-6 बार काटा जा सकता है ।

2. पालक पूसा ज्योति (Palak Pusa Jyoti)- यह जाति अधिक पैदावार देती है । पत्तियां समान, मुलायम होती हैं तथा गहरी हरे रंग की होती हैं । पहली कटाई 40-45 दिनों में आरम्भ हो जाती है । सितम्बर से फरवरी के अन्त तक पत्तियों की वृद्धि अधिक होती है । 8-10 बार फसल की कटाई की जाती है । यह फसल 45 हजार किलोग्राम-हेक्टर पैदावार देती है ।

3. पालक पूसा हरित (Palak Pusa Harit)- इस किस्म के पौधे ऊंचे, एक समान तथा वृद्धि वाले होते हैं । अधिक पैदा देने वाली किस्म है जो सितम्बर से मार्च तक अच्छी वृद्धि करती है ।

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बैगन की खेती

Tue, 05/08/2018 - 13:29

वैज्ञानिक तरीके से करे बैगन की खेती

सामान्य परिचय  :-  किसान बाग़वानी में आज बैंगन की खेती को वैज्ञानिक तरीके से कैसे करते है। इस पर बतायेग

परिचय   बैंगन की खेती भारत और चीन में ज्यादा की जाती है। ऊंचे पहाड़ि इलाकों को छोड़कर पुरे देश में इसकी खेती की जा सकती है। क्यों की भारत की जलवायु गर्म होती है और ये began ki kheti के लिए उपयुक्त रहती है।

बैंगन की किस्में :-

 बैंगन की बहुत सारी किस्में होती है। में कुछ विशेष किस्मों के बारे में यहाँ पर बताउगा जो hiybird है। और अच्छा उत्पादन देने वाली होती है।

1 पूसा 

    इसमे पौधा बड़ा और अच्छी शाखाओं युक्त होता है। ये फसल 80 से 90 दिनों आ जाती है।

प्रति हेक्टेयर 450 से 600 क्विंटल होती है। 

2 पूसा 

गोल फल लगते है। 85 से 90 दिनों की औसत प्रति हेक्टेयर 500 से 600 क्विंटल

3 पूसा 

85 से 90 दिनों में फल लगते है।

औसत 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

इसके अलावा पूसा क्रांति,पूसा भैरव,पूसा बिंदु,पूसा उत्तम ,पूसा उपकार,पूसा अंकुर, जो की प्रति हेक्टेयर 200 से 400 क्विंटल तक उत्पादन देते है। 

कैसे करे नर्सरी तैयार :-

नर्सरी तैयार करने के लिए खेत की मिट्टी को अच्छे से देसी खाद् (गोबर) को मिट्टी की सतह पर बिखेर कर फिर जुताई करे। (अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करावे ताकि उचित मात्रा में खाद् दे सके) जुताई होने के बाद उठी हुई क्यारियां बना ले फिर एक हेक्टेयर के लिए hibird बीज 400 ग्राम तक  काफी होता है। बनी हुई क्यारियों में  1 से.मी. की गहराई में 6 से 7 सेमी. की दूरी पर बीजो को डाल दे।  फिर उसे पर्याप्त मात्रा में पानी देते रहे ।

कब करे बुआई :-

उसे तो इस फसल को पुरे वर्ष में सभी ऋतुओ में लगाया जा सकता है। लेकिन में आपको माह से बता देता है।
नर्सरी मई जून में करने पर बुआई 1 या डेढ़ माह में यानि जून या जुलाई तक कर सकते है।
जो नर्सरी नवम्बर में लगाते है उसे जनवरी में शीत लहर और पाले का प्रकोप से बचा कर लगा सकते है
जो नर्सरी फरवरी और मार्च में लगाते है उसे मार्च लास्ट और अप्रैल तक की जा सकती है।

कैसे करे खेत तैयार:-

नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता है खेत को तैयार करना । मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद् बिखेर दे।

              गोबर से खाद् कैसे बनाने के लिए पढ़े

उसके बाद 2 बेग यूरिया 3 बेग सिंगल सुपर फास्फेट और पोटेशियम सल्फ़ेट की मात्रा ले कर जुताई करे। फिर खेत में 70 सेमी. की दूरी पर क्यारियां बना लीजिए अब पोधों को 60×60 सेमी. या 60×50 में पोधों की रोपाई करे।

बैंगन की फसल में लगने वाले रोग 

नर्सरी में लगने वाले रोग:-
आद्रगलन(डम्पिंगऑफ़)
यह एक कवक है जो पोधों को बहार से निकलने से पूर्व ही ख़त्म कर देता है। और बहार निकलने के बाद भी पोधों को सूखा देता है।
रोपाई के बाद लगने वाले रोग:-
झुलसा रोग,पत्ता धब्बा रोग,अंग मारी रोग,मलानी रोग,छोटी पत्ती रोग,सुतकर्मि रोग,
बैंगन की फसलो में लगते है। जिनका समय समय पर उपचार आवश्यक रूप से करे।

     

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पपिते की खेती

Thu, 05/03/2018 - 12:32

पपीता की खेती करने से आपको कम खर्च में ज्यादा benefit हो सकता है। खाने में स्‍वादिष्‍ट लगने वाला फल पपीता में विटामिन ए, सी और इ पाया जाता है। पपीते में  पपेन नामक पदार्थ पाया जाता है जो अतिरिक्त चर्बी को गलाने के काम आता है। पपीता सबसे कम समय में तैयार होने वाला फल है जिसे पके तथा कच्चे दोनों रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए इसकी खेती कि लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। 

वैसे तो पपिते की खेती भारत में किसी भी राज्य में की जा सकती है परन्तु छत्तीसगढ़ के किसानो को पपीते की खेती करने की सलाह दी जाती है क्योंकि वहां का तापमान  पपीते के मुताबिक है। पपीता के सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तक का तापमान उपयुक्त होता है ।

अधिक ठण्ड से खेती को नुकसान पंहुचा सकता है जिससे पौधा और फल दोनों ख़राब हो सकता है। देश के कई राज्यों में जैसे  बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा,और  दिल्ली में इसकी खेती कि जा रही है । किसान स्वयं और राष्ट्र को आर्थिक दृष्टी से लाभांवित कर सकते है इसके लिए तकनिकी रूप में निम्न बातो का ध्यान रखना चाहिए 

मिट्टी का चयन -पपीता लगाने के लिए भूमि का अच्छे से त्यारी करना चाहए, कृषि वैज्ञानिक पपीता के अच्छी उपजाव के लिए और अधिक उत्पादन के लिए बालुई दोमट मिट्टी की सलाह देते है जिसमे जल निकास कि व्यवस्था अच्छी हो । भूमि की अच्छे से जुताई कर लेना चाहए।गहरा जुताई करने के बाद खेत से सारे खर-पतवार को अच्छे से साफ़ कर लेना चाहए

पपीता के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। जिस जगह पर नर्सरी हो उस  जगह कि अच्छी जुताई करके समस्त कंकड़  पत्थर निकाल कर साफ कर देना चाहिए ।

बीज कि मात्रा एक हे.के (hectare) लिए 500 ग्राम काफी होती है बीज अच्छे से पका हुआ , अच्छी तरह सुखा हुआ और शीशे के बोतल में रखा हो जिसका मुहं ढका  हो और 6 महीने से पुराना न हो। संकर (hybrid) किस्म की बिजे उत्पादकता और गुणवता दोनों ही तरह से अच्छा होता है। ऐसा माना जाता है की संकर बीजो से उत्पन सभी पौधे जादातर मादा या उभयलिंग होता है।</p>

पपीते के दो पौधों के बिच कम से कम 2 मीटर की दुरी होनी चाहए। पपीता बोने के लिए त्यार उचित माप के गढ़ढ़ो के मिटटी को 15 से 20 दिनों के लिए खुले हवा और धुप में रखने के बाद उसमे गोबर की खाद 10 kg, सुपर फास्फेट 200g, म्यूरेट ऑफ पोटाश 75g, और एन्डोसल्फान 50g,मिलाकर भर देना चाहये।अच्छे से पपीता का रोपन हो जाने से 5 से 6 महीने में फल आने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

किट पतंग से बचाव

जैसा की हम जानते है अगर किसी भी पेड़ या पौधे में कीड़े मकोड़े लग जाये तो वो पुरे पेड़ पौधे को नष्ट कर देता है। आमतौर पर माना जाता है की पपीता  में जादा कीड़े मकोड़े नहीं लगते है लेकिन फिर भी कभी कभी अगर जादा गर्मी या जादा ठंड होती है तो उसकी वजह से फल खराब हो सकता है। इसलिए किसानो के लिए ये जानना बहुत हीं जरुरी है की पपीता में  कीड़े मकोड़े , fungus , या फिर virus, किस कारण से लगते है और उनसे बचने की विधि क्या है।

अपने पपीते के फसल को वेज्ञानिक तरीके से बचा सकते है

 

लाल मकड़ी किट

माहू किट

 

आद्रगलन किट- ये एक fungus दवारा होने वाला रोग है। इस रोग में पौधे का तना प्रारंभिक रूप से गल जाता है। इस रोग से बचाव के लिए बिज का भली भांती उपचारित होना जरुरी है।</li>

मोज़ेक किट – ये पपीते का virus से होने वाला एक रोग होता है। इससे बचने के लिए प्रभावित पौधे को उखाड़ कर फेंक देना चाहए।

 

पपीते की खेती की कुल प्रतिशत में से केवल 0.08% हीं निर्यात(export) किया जाता है बाकीं अपने ही देश के उपयोग में लाई जाती है। अगर आप papita ke kheti के बारे में सोच रहे है तो आप इसी विधि से खेती करे। इस खेती में आपको बहुत आमदनी होगी।

 ध्यान रहे की उचित समय में पपिते की फल को तोड़ कर उसे सब्जी मंडी (sabji mandi) में बेच दिया करे ताकि फल ख़राब होने से पहले हे बिक जाये .

साभार: http://www.hindiremedy.com/papita-ki-vaigyanik-kheti-jankari/

मूली की खेती कैसे करे

Thu, 05/03/2018 - 12:29

मूली वा मूलक भूमी के अन्दर पैदा होने वाली सब्ज़ी है। वस्तुतः यह एक रूपान्तिरत प्रधान जड़ है जो बीच में मोटी और दोनों सिरों की ओर क्रमशः पतली होती है। मूली पूरे विश्व में उगायी एवं खायी जाती है। मूली की अनेक प्रजातियाँ हैं जो आकार, रंग एवं पैदा होने में लगने वाले समय के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। कुछ प्रजातियाँ तेल उत्पादन के लिये भी उगायी जाती है।

आज के समय में यह कहना कि मूली सिर्फ इसी मौसम में लगाई जाती है या लगाई जाना चाहिए, उचित नहीं होगा, क्योंकि मूली हमें हर मौसम व समय में उपलब्ध हो जाती है। अतः कृषक भाई चाहें तो निर्धारित समय अंतराल के साथ ही कभी भी मूली की खेती कर सकते हैं। सामान्यतः मैदानी क्षेत्रों के लिए बुवाई के लिए सितंबर से फरवरी तक का समय उत्तम होता है। 5-6 जुताई कर खेत को तैयार किया जाए। मूली की एक हैक्टेयर खेती के लिए 5-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। मूली की बुवाई खेत की मेढ़ों पर की जाती है। यहाँ मेढ़ों के बीच की दूरी 45 सेमी तथा ऊँचाई 22-25 सेमी रखी जाती है। किसान भाई यह अवश्य ध्यान रखें कि मूली के बीजों का बीजोपचार अवश्य हो। इसके लिए थीरम 2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपयोग कर सकते हैं।

उन्नत किस्म का चयन करें 
अन्य फसलों व सब्जियों की ही तरह मूली की भरपूर पैदावार के लिए आवश्यक होता है कि कृषक भाई उन्नत जाति का चयन करें। मूली की उन्नत किस्मों में प्रमुख हैं- पूसा हिमानी, पूसा चेतवी, पूसा रेशमी, हिसार मूली नं. 1, पंजाब सफेद, रैपिड रेड, व्हाइट टिप आदि। पूसा चेतवी जहाँ मध्यम आकार की सफेद चिकनी मुलायम जड़ वाली है, वहीं यह अत्यधिक तापमान वाले समय के लिए भी अधिक उपयुक्त पाई गई है। इसी तरह पूसा रेशमी भी अधिक उपयुक्त है तथा अगेती किस्म के रूप में विशष महत्वपूर्ण है। इसी तरह अन्य किस्में भी अपना विशेष महत्व रखती हैं तथा हर जगह, हर समय लगाई जा सकती हैं। 

गोबर की खाद उपयुक्त 
कृषक भाइयों को सलाह दी जाएगी कि वे अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करवा लें। परीक्षण उपरांत ही वे अपने खेत में दी जाने वाली उर्वरकों व खाद की मात्रा निर्धारित करें। मूली की पैदावार के लिए गोबर-कचरे की कम्पोस्ट खाद का भरपूर उपयोग करें। साथ ही साधारणतः इसमें 75 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश देना चाहिए। गोबर व गोबर कचरे से बनी कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई में दे देना चाहिए तो लाभकारी होता है। मूली की बुवाई के पश्चात यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि मेढ़ों पर खरपतवारों की बढ़त न हो। खरपतवार के लिए समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। साथ ही मेढ़ों पर मिट्टी भी चढ़ाते रहना चाहिए। 

नमी का ध्यान रखें 
मूली की जड़ों की अच्छी बढ़त के लिए आवश्यक है कि हम नमी का पर्याप्त ध्यान रखें। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई की व्यवस्था करना चाहिए। मूली की फसल खुदाई के लिए 25 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। विभिन्न किस्मों के पकने का समय प्रायः अलग-अलग होता है। अतः कृषक भाई खुदाई का अवश्य ध्यान रखें, क्योंकि खुदाई में थोड़ा भी विलंब जड़ों को खराब कर देता है, जो खाने योग्य नहीं रह पातीं। अतः कृषक भाई स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सब्जियों में अपना विशेष महत्व रखने वाली सलाद का एक प्रमुख अंग मूली की खेती कर विपुल लाभ कमाएँ तथा अपनी आमदनी बढ़ाएँ। 

Category: खेतीTags: मूली

गेहूं की अधिक उपज देने वाली किस्में

Thu, 05/03/2018 - 12:20

अच्छी फसल लेने के लिए गेहूं की किस्मों का सही चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न अनुकूल क्षेत्रों में समय पर, तथा प्रतिकूल जलवायु, व भूमि की परिस्थितियों में, पक कर तैयार होने वाली, अधिक उपज देने वाली व प्रकाशन प्रभावहीन किस्में उपलब्ध हैं। उनमें से अनेक रतुआरोधी हैं। यद्यपि `कल्याण सोना' लगातार रोग ग्रहणशील बनता चला जा रहा है, लेकिन तब भी समय पर बुआई और सूखे वाले क्षेत्रों में जहां कि रतुआ नहीं लगता, अच्छी प्रकार उगाया जाता है। अब `सोनालिका' आमतौर पर रतुआ से मुक्त है और उन सभी क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहां किसान अल्पकालिक (अगेती) किस्म उगाना पसन्द करते हैं। द्विगुणी बौनी किस्म `अर्जुन' सभी रतुओं की रोधी है और मध्यम उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में समय पर बुआई के लिए अत्यन्त उपयोगी है, परन्तु करनल बंटा की बीमारी को शीघ्र ग्रहण करने के कारण इसकी खेती, पहाड़ी पट्टियों पर नहीं की जा सकती। `जनक' ब्राऊन रतुआ रोधी किस्म है। इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में भी उगाने की सिफारिश की गई है। `प्रताप' पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वर्षा वाले क्षेत्रों में मध्यम उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में अच्छी प्रकार उगाया जाता है। `शेरा' ने मध्य भारत व कोटा और राजस्थान के उदयपुर मंडल में पिछेती, अधिक उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों में, उपज का अच्छा प्रदर्शन किया है।

`राज ९११' मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में सामान्य बुआई व सिंचित और अच्छी उपजाऊ भूमि की परिस्थिति में उगाना उचित है। `मालविका बसन्ती' बौनी किस्म महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश की अच्छी सिंचाई व उपजाऊ भूमि की परिस्थितियों के लिए अच्छी है। `यू पी २१५' महाराष्ट्र और दिल्ली में उगाई जा रही है। `मोती' भी लगातार प्रचलन में आ रही है। यद्यपि दूसरे स्थानों पर इसको भुलाया जा रहा है। पिछले कई वर्षों से `डबल्यू जी-३५७' ने बहुत बड़े क्षेत्र में कल्याण सोना व पी वी-१८ का स्थान ले लिया है। भिन्न-भिन्न राज्यों में अपनी महत्वपूर्ण स्थानीय किस्में भी उपलब्ध हैं। अच्छी किस्मों की अब कमी नहीं हैं। किसान अपने अनुभव के आधार पर, स्थानीय प्रसार कार्यकर्ता की सहायता से, अच्छी व अधिक पैदावार वाली किस्में चुन लेता है। अच्छी पैदावार के लिए अच्छे बीज की आवश्यकता होती है और इस बारे में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।

Category: खेतीTags: गेहूं

बीन्स की फलियों की खेती इस प्रकार

Thu, 05/03/2018 - 12:10

बीन्स यानी फलियां लेगुमिनेसी परिवार से संबंध रखती है और अपने हरे फलियों के लिए देश भर में उपजाई जाने वाली सब्जी की एक बहुत महत्वपूर्ण फसल है। फलियों के पौधे में उपर चढ़ने की प्रवृत्ति भी पाई जाती है। भारत में इन फलियों का इस्तेमाल रोजमर्रा की सब्जियों में, मवेशियों के चारे के तौर पर और मिट्टी में सुधार के लिए भी किया जाता है। हरी फलियों की खेती उनके पूरी तरह पकने से पहले बीन्स के फली में रहते हुए की जाती है। यह दूसरी फली वाली सब्जियों के मुकाबले ज्यादा पोष्टिक होते हैं, यही वजह है कि स्थानीय बाजार में इनकी बहुत अच्छी मांग होती है। इस आलेख में भारत में होनेवाली फली (बीन्स) और फ्रेंच बीन्स के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है

बीन्स की फली के भारत में अनेक प्रकार के नाम-

कमल ककड़ी (हिंदी), कक्कारी (मलयालम), ककड़ी (मराठी), दोसाक्या (तेलुगु), वेल्लारीक्काई (तमिल)

सेम के लिए उत्तम निकास वाली दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है

सेम ठंडी जलवायु कीफसल है। इसके लिए उत्तम निकास वाली दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है। अधिक क्षारीय और अधिक अम्लीय भूमि इसकी खेती में बाधक मानी गई है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके बाद 2-3 बार कल्टीवेटर या हल चलाएं प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं…

 

बीज बुआई

बोने का समय-अगेती फसल-फरवरी, मार्च। वर्षाकालीन फसल-जून जुलाई। रजनी नामक किस्म अगस्त के अंत तक बोई जाती है।

बीज की मात्रा – प्रति हेक्टेयर 6 किलो ग्राम बीज पर्याप्त होता है।

दूरी – पंक्तियों और पौधों की आपसी दूरी क्रमश: 90 सेमी और 90 सेमी रखें। सेम को चौड़ी क्यारियों में बोएं। 1.5 मीटर की चौड़ी क्यारियां बनाएं उनके किनारों पर 50 सेमी की दूरी पर 2-3 सेमी की गहराई पर बीज बोएं।

आर्गेनिक खाद

सेम की फसल की अच्छी उपज लेने के लिए उसमें आर्गेनिक खाद, कम्पोस्ट खाद का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी है। इसके लिए एक हेक्टेयर भूमि में 40-50 क्विंटल अच्छे तरीके से सड़ी हुई गोबर की खाद और आर्गेनिक खाद 2 बैग भू-पावर वजन 50 किलो ग्राम, 2 बैग माइक्रो फर्टी सिटी वजन 40 किलो ग्राम, 2 बैग माइक्रो नीम वजन 20 किलो ग्राम, 2 बैग सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट वजन 10 किलो ग्राम, 2 बैग माइक्रो भू-पावर वजन 10 किलो ग्राम और 50 किलो अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण बनाकर खेत में बुआई से पहले समान मात्रा में बिखेर लें और खेत की अच्छे तरीके जुताई कर खेत को तैयार करें इसके बाद बुआई करें। और जब फसल 25-30 दिन की हो जाए तब उसमें 2 बैग सुपर गोल्ड मैग्नीशियम और माइक्रो झाइम 500 मिली को 400-500 लीटर पानी में मिलाकर अच्छी प्रकार से मिश्रण तैयार कर फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें और हर 15-20 दिन के अंतर से दूसरा व तीसरा छिड़काव करें।

सिंचाई

फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। वर्षाकालीन फसल में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। यदि वर्षा काफी समय तक न हो तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। फरवरी मार्च में 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

तुड़ाई

जुलाई-अगस्त में बोई जाने वाली फसल में नवंबर-दिसंबर में फूल निकल आता है। फूल निकलने के 2-3 सप्ताह बाद फलियों की पहली तुड़ाई की जा सकती है। फलियों की तुड़ाई में देरी नहीं करनी चाहिए अन्यथा फलियां कठोर हो जाती हैं, जिसके कारण उनका बाजार में उचित भाव नहीं मिल पाता है, क्योंकि उनसे स्वादिष्ट सब्जी का निर्माण नहीं होता है।

उपज – इसमें प्रति हेक्टेयर 50-80 क्विंटल तक हरी फलियां मिल जाती हैं।

Category: खेती

आलू की खेती

Thu, 05/03/2018 - 12:03

मौसम में बदलाव आते ही जम्मू संभाग के मैदानी इलाकों में आलू की खेती का सीजन शुरू हो जाएगा। आलू की बेहतर पैदावार के लिए किसानों को अभी से ही योजना बनाकर खेती की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए, क्योंकि भूमि जितनी ज्यादा नरम होगी, जमीन के अंदर आलू की उतनी ज्यादा गांठें बनेगी और बढ़ेंगी। आलू उत्पादन के विशेषज्ञ यूएस सूदन का कहना है कि जम्मू में 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक आलू की बिजाई की जा सकती है, लेकिन डेढ़ माह पहले जमीन तैयार करने का काम शुरू हो जाना चाहिए। 90 से 120 दिनों में फसल तैयार हो जाती है।

कैसे करें खेती की तैयारी

-जिन किसानों ने आलू के लिए सुरक्षित रखे खेतों में जैंतरी लगाई हुई है, उस पर हल चला दें ताकि यह जैंतरी जमीन में मिलकर खाद बन जाए।

-10 अगस्त से 15 सितंबर तक जमीन पर तीन से चार बार हल चलाकर समतल करें ताकि जमीन पूरी तरह से नरम हो जाए।

-एक कनाल भूमि में तीन किलो यूरिया, 10 किलो डाया व 10 किलो पोटाश खाद डाली जाए।

-इस दौरान खेतों में 4ए10 जी पाउडर जमीन में मिलाया जाना चाहिए ताकि जमीन के अंदर पनप रहे कीट खत्म हो सकें।

-आलू के बीज लगाने से पहले जमीन पर ओलियां बना दें।

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इन बीजों का करें इस्तेमाल

-जम्मू में कुफरी बादशाह, कुफरी सिंदूरी, कुपरी लवकार किस्में लगा सकते हैं। अगर चिप्स बनाने के लिए आलू चाहिए तो कुफरी चिप सोना लगाएं।

कैसे लगाएं आलू के बीज

-आलू के बीज को घर के अंदर हवादार वातारण में खुला छोड़ दें। जब आलू की आंख से अंकुर दिखने लगें तो इसे बोया जा सकता है।

-पौधे से पौधे की दूरी आठ इंच व कतार से कतार तक दूरी डेढ़ फुट तक होनी चाहिए।

- 21 से 25 दिन के बाद पौधों की गड़ाई करें और पौधे की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाई जाए। इसी बीच एक कनाल भूमि पर तीन किलो यूरिया डाला जाए।

-पहली सिंचाई 10 से 15 दिनों में होनी चाहिए। ध्यान रहे आलू की बनाई गई ओली के में 25 फीसद पानी भर जाए।

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कैसे बचाए लेट ब्लाइट से फसल

आलू की फसल पर मौसम के उतार चढ़ाव व कोहरे के कारण लेट ब्लाइट बीमारी का अंदेशा ज्यादा रहता है। इसलिए फसल देरी से नही लगानी चाहिए। अगर फसल लेट ब्लाइट की चपेट में आ जाए तो एम 45 या रोडोमिल दवा का छिड़काव जरूरी है।

Category: खेती

जायफलकी खेती

Sat, 04/28/2018 - 11:09

 परिचय

जीनस मिरिस्टिका में पेड़ों की कई प्रजातियों में जायफल होते हैं। व्यावसायिक प्रजातियों में से मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति है, यह सदा बहार वृक्ष मूल रूस से इंडोनेशिया के मोलुकस के बंडा द्वीप या स्पाइस द्वीप में पाए जाते हैं। जायफल वृक्ष दो मसालों के लिए काफी महत्वपूर्ण है जो जायफल और जावित्री दो फलों से लिया गया है।[1]

वृक्ष की वास्तविक बीज जायफल है, जो मोटे तौर पर अंडे के आकार का होता है और 20 से 30 मि॰मी॰ (0.07 से 0.1 फीट) लंबा और 15 से 18 मि॰मी॰ (0.05 से 0.06 फीट) चौड़ा और 5 और 10 ग्राम (0.2 और 0.4 औंस) के बीच वजन होता है, जबकि जावित्री एक सूखा "लैसदार" लाल कवर या बीज को ढ़कने वाला छिलका होता है। यही एक ऐसा उष्णकटिबंधीय फल है जिसका स्रोत दो अलग मसाले हैं।

इसके वृक्ष से कई अन्य व्यावसायिक उत्पादों का भी उत्पादन होता है, जिसमें आवश्यक तेल, निचोड़े हुए ओलियोरेसिन्स और जायफल मक्खन शामिल हैं (नीचे देखें).

जायफल का बाहरी सतह आसानी से कुचल जाता है।

पेरिक्रेप (फल / फली) का प्रयोग ग्रेनाडा में जैम बनाने के लिया किया जाता है जिसे "मोर्ने डेलिस" कहा जाता है। इंडोनेशिया में भी इस फल से जैम बनाया जाता है जिसे सेलेई वुआह पाला कहा जाता है या इसे पतले रूप में काट कर चीनी के साथ पकाया जाता है और सुगंधित कैंडी बनाने के लिए उसे रवादार बनाया जाता है जिसे मनिसन पाला कहा जाता है ("जायफल मिठाई").

सामान्य या सुगंधित जायफल मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस का मूल उत्पादन इंडोनेशिया के बांडा द्वीप में होता है लेकिन मलेशिया के पेनांग द्वीप और कैरिबियन में भी इसका उत्पादन होता है, विशेष कर ग्रेनाडा में. साथ ही इसकी उपज केरल में भी होती है, जो भारत के दक्षिण भाग में स्थित एक राज्य है। जायफल के अन्य प्रजातियों में न्यू गुइयाना से पपुअन जायफल M. अर्जेनटिया, भारत से बम्बई जायफल M. मालाबरिका, जिसे हिन्दी में जायफल कहते हैं, शामिल हैं; दोनों का उपयोग M. फ्रेग्रेंस के अपमिश्रक उत्पाद के रूप में होता है।

प्रमुख मिरिस्टका प्रजातियां

  
M. अलिल्बा
M. M. अंडामानिका
M. अर्फाकेनसिस
M. अर्जेंटिया
M. बसिलानिका
M. ब्राचेपोडाbrachypoda
M. ब्रेविटाइप्स
M. बुचनेरियाना
M. बिसासिया
M. सिलानिका
M. सिनामोमिया
M. कोयक्टा
M. कोलिनरिड्सडालेई
M. कोंसपर्सा
M. कोर्टीसाटा
M. क्रासा
  
M. डेसीकार्पा
M. डेप्रेसा
M. डेवोजेली
M. एलिपटिका
M. एक्सटेंसा
M. फेसीकुलाटा
M. फिलिपेस
M. फिसुराटा
M. फ्लेवोविरेंस
M. फ्रेग्रंस
M. फ्रुगीफेरा
M. जिगांटिया
M. गिलेसपियाना
M. ग्लोबोसा
M. ग्रांडीफोलिया
M.ग्वाडालकेनालेंसिस
M. ग्वेटरीफोलिया
 
M.ग्विलामिनियाना
M. होल्लरूंगी
M. इनायक्एम्पयाटा
वेलिस
M. इनक्रेडिबिलिस
M. इनर्स
M. इनुनडाटा
M. इनुटिलिस
M. कल्कमनी
M. जेलबर्गी
M. लेप्टोफिला
M. मेक्रोफिला
M. मालाबरिका
M. मेक्सिमा
M. ओटोबा
M. प्लाटीपर्मा
M. सिंकलेयरी
M. जायलोकर्पाxylocarpa
 

रसोई में प्रयोग[संपादित करें]

 

जायफल का वृक्ष

जायफल और जावित्री का स्वाद गुण लगभग समान होता है, जायफल थोड़ा अधिक मीठा होता है वहीं जावित्री का स्वाद अधिक स्वादिष्ट होता है। अक्सर जावित्री को हल्के खाद्य पदार्थों में इसके नारंगी और केसरिया रंग के कारण प्रयोग किया जाता है। जायफल में अतिरिक्त रूप से चीज़ सॉसमिलाने से वह और भी स्वादिष्ट हो जाता है और वह सबसे ताजा अंगीठी है (अंगीठी जायफल देखें). म्यूल्ड साइडर(बिना अल्कोहल वाला सेब की मदिरा),म्यूल्ड शराब और एग्गनोग में जायफल एक परंपरागत मसाला है।

पेनांग व्यंजनों में जायफल का अचार बनाया जाता है और ये अचार टोपिंग्स के रूप में विशिष्ट पेनांग एस कसांग पर कटे होते हैं। जायफल मिश्रित भी होते हैं (ताजा बनाने के लिए, हरे, टंगी स्वाद और सफेद रंग का रस) या उबले हुए होते हैं (परिणामस्वरूप बहुत मीठा और भूरे रंग का रस होता है) जिससे आइस्ड जायफल का रस बनाया जाता है या पेनांग होक्केन जिसे "लाउ हउ पेंग" कहा जाता है, के रूप में बनाया जाता है।

भारतीय व्यंजनों में जायफल का प्रयोग मिठाई के साथ-साथ स्वादिष्ट व्यंजनों में किया जाता है (मुख्य रूप से मुगलाई व्यंजनों में). भारत के अधिकांश भागों में इसे जायफल के रूप में जाना जाता है वहीं केरल में इसे जतिपत्रि और जथी बीज कहा जाता है। इसका प्रयोग कम मात्रा में गरम मसाले में भी किया जा सकता है। भारत में भूमि जायफल का प्रयोग धूम्रपान के लिए भी किया जाता है।

मध्य पूर्वी व्यंजनों में भूमि जायफल का इस्तेमाल अक्सर स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए एक मसाले के रूप में किया जाता है। अरबी में जायफल को Jawzt at-Tiyb कहा जाता है।

ग्रीस और साइप्रस में जायफल को μοσχοκάρυδο (मोस्चोकारीडो) (ग्रीक: "मुस्की नट") और खाना पकाने और स्वादिष्ट व्यंजनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

यूरोपीय व्यंजनों में जायफल का इस्तेमाल विशेष रूप से आलू के व्यंजनो और परिष्कृत मांस उत्पादों में की जाती है; सूप, सॉस और पके हुए भोजन में भी वे इसका इस्तेमाल करते हैं। डच व्यंजनों में जायफल काफी लोकप्रिय है, चोकीगोभी, गोभी और पतले सेम की तरह सब्जियों में इसका उपयोग किया जाता है।

विभिन्न जापानी करी पाउडर में जायफल का इस्तेमाल एक घटक के रूप में शामिल किया जाता है।

कैरेबियन में जायफल का इस्तेमाल अक्सर बुशवेक्कर, पेनकिलर, बार्वाडोस रम पंच जैसे पेय पदार्थो में किया जाता है। आमतौर पर इसे सिर्फ पेय पदार्थ के ऊपर छिड़का जाता है।

महत्वपूर्ण तेल

 

जायफल बीज

भूमि जायफल के भाप आसवन द्वारा महत्वपूर्ण तेल प्राप्त किया जाता है और इत्रादि सुगंधित वस्‍तुऍं या सामग्री और दवा में उद्योगों में भारी मात्रा में इसका इस्तेमाल किया जाता है। यह तेल रंगहीन या हल्का पीले रंग की होती है और इसमें जायफल की खुशबू और स्वाद आती है। ओलियोकेमिकल उद्योग के लिए इसके अनेक अंश महत्वपूर्ण होते हैं और बेक किया हुए पदार्थों, सीरप्स, पेय पदार्थों और मिठाई में एक प्राकृतिक खाद्यपदार्थ के स्वाद के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह भूमि जायफल को प्रतिस्थापित करता है चूंकि यह भोजन में अंश को नहीं छोड़ता. इस महत्वपूर्ण तेल का इस्तेमाल कॉस्मेटिक और दवा उद्योगों में भी किया जाता है, उदाहरणस्वरूप टूथपेस्ट में और कुछ खांसी की दवाईयों प्रमुख संघटक के रूप में प्रयोग किया जाता है। परंपरागत चिकित्सा में जायफल और जायफल तेल का इस्तेमाल नसों और पाचन प्रणाली से संबंधित बीमारियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

जायफल मक्खन

जायफल के बीज के निष्पीड़न से जायफल बटर की प्राप्ती होती है। यह अर्ध-ठोस और भूरे रंग की लाल होती है और इसमें जायफल का स्वाद और खुशबू आती है। जायफल का लगभग 75% (वजन द्वारा) बटर ट्रिमिरिल्स्टिन होता है जिसे मिरिस्टिक एसिड में तब्दील किया जा सकता है, एक 14-कार्बन फैटी एसिड, कोकोआ बटर के लिए एक स्थानापन्न के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और दूसरे चर्बियों के साथ मिश्रित किया जा सकता है जैसे कॉटनसीड तेल या ताड़ का तेल और एक औद्योगिक लुब्रिकेंट के रूप में भी संप्रयोग किया जाता है।

इतिहास

 

जायफल के अंदर मेस (लाल)

कुछ सबूत सुझाव देते हैं कि रोमन पादरी जायफल का इस्तेमाल अगरबत्ती के रूप में करते थे, हालांकि यह विवादास्पद है। यह जाना जाता है कि मध्ययुगीन व्यंजनों में यह महत्वपूर्ण और महंगा मसाला था जिसका इस्तेमाल व्यंजनों में स्वाद के लिए और दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता था और साथ ही एजेंटो के संरक्षण में भी इसका इस्तेमाल था क्योंकि उस समय यूरोपीय बाजारों में ये काफी मूल्यवान था। सेंट थियोडेर द स्टुडिटे (ca. 758 -. Ca 826) अपने संन्यासियों को उनके मटर के हलवा पर जब खाने की आवश्यकता होती थी तब उस पर जायफल छिड़कने की अनुमति देने के लिए प्रसिद्ध था। एलिज़ाबेथन के समय में ऐसा माना जाता था कि जायफल ने प्लेग को दूर किया था इसलिए जायफल काफी लोकप्रिय था।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

विश्व भर में एक छोटा सा बांडा द्वीप ही जायफल और जावित्री का एकमात्र स्रोत था। मध्य युग के दौरान जायफल का अरब द्वारा कारोबार किया गया और वेनिस को अत्यधिक कीमतों के लिए बेच दिया गया था, पर व्यापारियों ने लाभदायक हिंद महासागर व्यापार में उनके स्रोत के सटीक स्थान को प्रकट नहीं किया था और कोई भी यूरोपीयन उनके स्थान का पता लगाने में सक्षम नहीं थे।

अगस्त 1511 में पुर्तगाल के राजा की ओर से अफोंसो दे अल्बुकर्क ने मलक्का पर विजय प्राप्त की, जो उस समय एशियाई व्यापार का केंद्र था। मलक्का को प्राप्त करने और बांडा स्थान के अध्ययन के बाद उस साल के नवंबर में अल्बुकर्क ने अपने एक अच्छे दोस्त एंटोनियो डे एब्रियू के नेतृत्व में तीन जहाजों के एक अभियान के साथ उन्हें खोजने के लिए भेजा. मलय पायलटों को या तो भर्ती कराया गया था या जबरन रखा गया था, उन्हें जावा द्वारा लेसर संडस और अम्बों से बांडा तक का निर्देशन दिया गया और 1512 के प्रारम्भ में वहां पहुंचे।[2] पहली बार यूरोपीयन बांडा तक पहुंचे और यह अभियान करीब एक महीने तक जारी बांडा में रहा और वे बांड़ा के जायफल और मेस की खरीदारी करते रहे और जहाज में रखते गए, साथ ही लाँग की भी खरीदारी एंटरपोट से की जिसका बंडा में एक सम्पन्न व्यापार था।[3] सुमा ओरियंटल किताब में पहली बार बांडा के व्यापार का वर्णन किया गया है जिसे एक पुर्तगाली औषधकार टोमे पिरेस द्वारा लिखा गया था और 1512 से 1515 के मलक्का के आधार पर यह किताब लिखी गई है। लेकिन इस व्यापार का पूरा नियंत्रण संभव नहीं था और जब से टर्नेट अधिकारियों ने बांडा द्वीप के जायफल उत्पादन पर नियंत्रण रखा, जो काफी सीमित था, तबसे वे मालिक के बजाए केवल हिस्सेदार बनकर रह गए। इसलिए, द्वीप में पुर्तगाली अपनी पकड़ मज़बूत करने में विफल रहे।

बाद में 17 वीं शताब्दी में डच ने जायफल के व्यापार में अपना वर्चस्व कायम किया। ब्रिटिश और डच लंबे समय तक द्वीप पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए संघर्ष में लगे रहे, जो जायफल का एकमात्र स्रोत था। द्वितीय आंग्ल-डच युद्ध के अंत में ब्रिटिश के उत्तरी अमेरिका में न्यू एम्सटरडेम (न्यूयार्क) पर नियंत्रण करने के बदले डच को इसकी नियंत्रण प्राप्त हुई।

1621 में द्वीप के अधिकांश निवासियों की हत्या या निष्कासन को समाप्त करने के लिए विस्तृत सैन्य अभियान के बाद बांडा द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने में डच सफल रहे। इसके बाद दूसरे स्थानों के जायफलों को उखाड़न के लिए वार्षिक स्थानीय युद्ध अभियानों को बढ़ाने के साथ बांडा द्वीप को वृक्षारोपण एस्टेट की एक श्रृंखला के रूप में नियंत्रित किया गया था।

नपालियान युद्धों के दौरान डच राजाओं के भीतर एक परिणाम के रूप में अंग्रेजों ने नेबांडा द्वीप पर अस्थायी रूप से नियंत्रण प्राप्त कर लिया और अपने औपनिवेशिक क्षेत्रों में जायफल का प्रतिरोपण किया, विशेष रूप से ज़ंजीबार और ग्रेनाडा में रोपण किया। आज एक जायफल की खंडित शैली ग्रेनाडा के राष्ट्रीय ध्वज पर पाई जाती है।

कनेक्टिकट से यह अपना उपनाम ("जायफल राज्य", "नट्मेगर") एक किंवदन्ति से प्राप्त करता है जिसमें कुछ विवेकहीन व्यापारी लकड़ी से खरोच-खरोच कर जायफल बना लेते थे जिसे "लकड़ी का जायफल" कहते थे (एक ऐसा शब्द जिसका अर्थ किसी भी जालसाजी से था) [2].

विश्व उत्पादन

 

मेस जायफल के लिए वाणिज्यिक जार

जायफल का विश्व उत्पादन प्रति वर्ष 10,000 और 12,000 टन (9,800 और 12,000 लंबे टन) के बीच अनुमानित है और विश्व भर में वार्षिक मांग 9,000 टन (8,900 लंबे टन) का अनुमान लगाया गया है और मेस का उत्पादन 1,500 से 2,000 टन (1,500 से 2,000 लंबे टन) अनुमानित है। इंडोनेशिया और ग्रेनाडा में इसका उत्पादन सबसे अधिक है और विश्व बाजार में क्रमशः 75% और 20% की हिस्सेदारी के साथ दोनों उत्पादों का निर्यात करता है। अन्य निर्माताओं भारतमलेशिया (विशेष रूप से पेनांगशामिल है जहां जंगली क्षेत्रों में पेड़ देशी हैं), पापुआ न्यू गिनीश्रीलंका और कैरेबियाई द्वीप जैसे सेंट विन्सेन्ट. मुख्य आयात बाजारों में यूरोपीय समुदायसंयुक्त राज्य अमेरिकाजापान और भारत हैं। सिंगापुर और नीदरलैंड दोबारा निर्यातकों में प्रमुख हैं।

एक समय में जायफल सबसे मूल्यवान मसालों में से एक था। इंग्लैंड में यह कहा गया है कि, कई सैकड़ों वर्ष पहले जीवन के लिए वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कुछ जायफलों को पर्याप्त पैसे में बेचा जा सकता था।

जायफल के पहले फसल बोने के बाद 7-9 साल में यह परिपक्वता प्राप्त करती है और 20 साल के बाद वृक्ष अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में सफल होती है।

मानसिक प्रभाव और विषाक्तता

कम मात्रा में जायफल शारीरिक या न्यूरोलॉजिकल प्रतिक्रिया पैदा नहीं करता है।

जायफल में मिरिस्टिसिन होता है एक कमजोर मोनोमाइन ओक्सीडेस इन्हिबिटर होता है। मिरिस्टियन विषाक्तन संक्षौभ, धकधकी, उबकाई, संभावित निर्जलीकरण और सामान्यीकृत शरीर दर्द को उत्प्रेरित कर सकता है।[4] इसे एक मजबूत प्रलापक माना जाता है।[5]

घातक मिरिस्टिसिन विषाक्तन मानव में बहुत दुर्लभ होते हैं, लेकिन अब तक दो की जानकारी मिली है, पहला है 8 वर्षीय बच्चे में और एक 55 वर्षीय प्रौढ़ में[7].

मिरिस्टिसिन विषाक्तन यहां तक कि रसोई मात्रा में भी संभावित पालतू और पशुओं के लिए घातक होता है। इस कारण से, उदाहरण स्वरुप पशु के खाद्य में एग्गनोग मिलाकर कुत्तों को नहीं खिलाने की सिफारिश की गई है।

आनंददायक दवा के रूप में प्रयोग

जायफल का स्वाद में कड़वापन होने के चलते आनंददायक दवा के रूप में इसका सेवन अलोकप्रिय है और इसके संभावित नकारात्मक पक्ष भी होते हैं जिसमें चक्कर आना, तमतमाहट, शुष्क चेहरा, तेजी से दिल की धड़कन, अस्थायी कब्ज, पेशाब में कठिनाई, उबकाई शामिल हैं। इसके अलावा आमतौर पर इसका अनुभव 24 घंटे से भी अधिक रहता है और कभी-कभी 48 घंटे से भी अधिक होता है जो आनंददायक के बजाय अव्यावहारिक बनाता है।

नशा और (आनंद) जायफल के प्रभावों की उन्मत्तता और MDMA (आनंद) के बीच प्रत्याशित तुलना की गई है।[9]

मैल्कम एक्स अपनी आत्मकथा में जेल कैदियों के जायफल पाउडर लेने की घटनाओं को बताया है, जो आमतौर पर एक गिलास पानी में पाउडर को मिलाकर पीते हैं और नशे में धुत हो जाते हैं। जेल गार्ड अंततः उनके इस अभ्यास को पकड़ लेता है और जेल प्रणाली में आनंददायक के रूप जायफल के इस्तेमाल पर रोक लगाने की कोशिश करता है। विलियम बुरोघ के नेकेड लंच की परिशिष्ट में उन्होंने उल्लेख किया है कि मरिजुआना की ही तरह जायफल भी अनुभव पैदा करता है लेकिन उबकाई से राहत देने के बजाए ये उसका कारण बन जाता है।

गर्भावस्था के दौरान विषाक्तता

जायफल को एक बार गर्भस्त्राव माना जाता था, लेकिन गर्भावस्था के दौरान रसोई उपयोग के लिए यह सुरक्षित हो सकता है। तथापि यह प्रोस्टाग्लैंडीन उत्पादन को रोकता है और इसमें विभ्रमजनक औषधियां होती हैं जिनका सेवन अधिक मात्रा में करने से गर्भ प्रभावित हो सकता है

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चन्दन की खेती

Thu, 04/26/2018 - 12:24

चन्दन

 

चन्दन का वृक्ष 

 

भारतीय चंदन (Santalum album) का संसार में सर्वोच्च स्थान है। इसका आर्थिक महत्व भी है। यह पेड़ मुख्यत: कर्नाटक के जंगलों में मिलता है तथा भारत के अन्य भागों में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। भारत के 600 से लेकर 900 मीटर तक कुछ ऊँचे स्थल और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं।

इस पेड़ की ऊँचाई 18 से लेकर 20 मीटर तक होती है। यह परोपजीवी पेड़, सैंटेलेसी कुल का सैंटेलम ऐल्बम लिन्न (Santalum album linn.) है। वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ

 उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सौगंधिक तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। इसकी पूर्ण परिपक्वता में 8 से लेकर 12वर्ष तक का समय लगता है। इसके लिये ढालवाँ जमीन, जल सोखनेवाली उपजाऊ चिकली मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।

 

चन्दन की एक डाली पर लगीं पत्तियाँ

 

तने की नरम लकड़ी तथा जड़ को जड़, कुंदा, बुरादा, तथा छिलका और छीलन में विभक्त करके बेचा जाता है। इसकी लकड़ी का उपयोग मूर्तिकला, तथा साजसज्जा के सामान बनाने में और अन्य उत्पादनों का अगरबत्ती, हवन सामग्री, तथा सौगंधिक तेज के निर्माण में होता है। आसवन द्वारा सुगंधित तेल निकाला जाता है। प्रत्येक वर्ष लगभग 3,000 मीटरी टन चंदन की लकड़ी से तेल निकाला जाता है। एक मीटरी टन लकड़ी से 47 से लेकर 50 किलोग्राम तक चंदन का तेल प्राप्त होता है। रसायनज्ञ इस तेल के सौगंधिक तत्व को सांश्लेषिक रीति से प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

चंदन के प्रसारण में पक्षी भी सहायक हैं। बीजों के द्वारा रोपकर भी इसे उगाया जा रहा है। सैंडल स्पाइक (Sandle spike) नामक रहस्यपूर्ण और संक्रामक वानस्पतिक रोग इस वृक्ष का शत्रु है। इससे संक्रमित होने पर पत्तियाँ ऐंठकर छोटी हो जाती हैं और वृक्ष विकृत हो जाता है। इस रोग की रोकथाम के सभी प्रयत्न विफल हुए हैं।

 

चंदन के न पर उस्थायोग पमें आनेवाले निम्नलिखित वृक्षों की लकड़ियाँ भी हैं 

 

  • (१) आस्ट्रेलिया में सैंटेलेसिई (Santalaceae) कुल का
  • (क) यूकार्या स्पिकैटा (आर.बी-आर.) स्प्रैग. एवं सम्म.उ सैंटेलम स्पिकैटम् (आर.बी-आर.) ए. डी-सी. (Eucarya Spicata (R.Br.) Sprag. et Summ, Syn. Santalum Spicatum (R.Br.) A.Dc.),
  • (ख) सैंटेलम लैंसियोलैटम आर. बी-आर. (Santalum lanceolatum (R.Br.)) तथा
  • (ग) मायोपोरेसी (Myoporaceae) कुल के एरिमोफिला मिचेल्ली बैंथ. (Eremophila mitchelli Benth.) नामक वृक्ष;
  • (२) पूर्वी अफ्रीका तथा मैडेगास्कर के निकटवर्ती द्वीपों में सैंटेलेसी कुल का ओसाइरिस टेनुइफोलिया एंग्ल. (Osyris tenuifolia Engl.); तथा
  • (३) हैटी और जमैका में रूटेसिई (Rutaceae) कुल का एमाइरिस बालसमीफेरा एल. (Amyris balsmifera L.), जिसे अंग्रेजी में वेस्ट इंडियन सैंडलवुड भी कहते हैं।
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बबूल की खेती

Thu, 04/26/2018 - 12:05

बबूल खेती

उत्तरी भारत में बबूल की हरी पतली टहनियां दातून के काम आती हैं। बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है। बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है। हमारे यहां दो तरह के बबूल अधिकतर पाए और उगाये जाते हैं। एक देशी बबूल जो देर से होता है और दूसरा मासकीट नामक बबूल. बबूल लगा कर पानी के कटाव को रोका जा सकता है। जब रेगिस्तान अच्छी भूमि की ओर फैलने लगता है, तब बबूल के जगंल लगा कर रेगिस्तान के इस आक्रमण को रोका जा सकता है। इस प्रकार पर्यावरण को सुधारने में बबूल का अच्छा खासा उपयोग हो सकता है।[2] बबूल की लकड़ी बहुत मजबूत होती है। उसमें घुन नहीं लगता. वह खेती के औजार बनाने के काम आती है।[3]बबूल या कीकर (वानस्पतिक नाम : आकास्या नीलोतिका) अकैसिया प्रजाति का एक वृक्ष है। यह अफ्रीका महाद्वीप एवं भारतीय उपमहाद्वीप का मूल वृक्ष है।

 

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देवदार की खेती

Thu, 04/26/2018 - 01:45

देवदार वृक्ष कहा  बढ़ता है

 

वैज्ञानिक-वनस्पतिशास्त्रियों ने चार प्रकार के देवदार में भेद किया:

 

  • लेबनान;
  • एटलस;
  • साइप्रस;
  • हिमालय

देवदार की पहली दो किस्में सबसे अधिक बार होती हैंउत्तरी अफ्रीका, साइप्रस साइप्रस के द्वीप पर, और हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में पाया - पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान में। इसके अलावा, लेबनान और एटलस देवदार पूरी तरह से जड़ Crimea के दक्षिणी तट पर साथ ही साथ कई भूमध्य देशों, जहां सर्दियों में तापमान -25 डिग्री नीचे चला जाता है में के रूप में लिया। और जहां साइबेरियाई देवदार बढ़ता है और क्यों यह 4 विज्ञान के लिए ज्ञात प्रजातियों की सूची में स्थान दिया गया है है? बात यह है कि, कडाई के साथ एक देवदार साइबेरियाई देवदार बिल्कुल नहीं है। साइबेरियाई देवदार आमतौर पर साइबेरियाई पत्थर पाइन की बात कर रहे के बारे में बोलते - एक शक्तिशाली पेड़, ऊंचाई में लगभग चालीस मीटर और परिधि में के बारे में ढाई मीटर तक पहुंच गया।

 

साइबेरियाई देवदार रूस में कहां बढ़ रहा है?

 

रूस में जंगली देवदार के जंगलों में पाया जा सकता हैTransbaikalia, साइबेरिया और Urals। अन्य क्षेत्रों में देवदार की खेती भी काफी सफल साबित हुई है। उदाहरण के लिए, साइबेरिया के देवदारों को मास्को क्षेत्र, लेनिनग्राद और यारोस्लावल क्षेत्रों में लगाया गया, न केवल सुरक्षित रूप से आदी हो गए, बल्कि नियमित रूप से फल भी उगाते हैं। पहली बार लंबी फसल के लिए सच प्रतीक्षा - प्राकृतिक परिस्थितियों में चालीस से सत्तर साल तक और देश में बढ़ते हुए पच्चीस वर्ष। साइबेरियाई देवदार एक या दो सौ साल की उम्र में फ्राईटिंग की चोटी पर पहुंच जाते हैं। इस वृक्ष का औसत जीवनकाल तीन सौ से पांच सौ साल तक होता है।

देवदार

देवदार (वैज्ञानिक नाम:सेडरस डेओडारा, अंग्रेज़ी: डेओडार, उर्दु: ديودار देओदार; संस्कृत: देवदारु) एक सीधे तने वाला ऊँचा शंकुधारी पेड़ है, जिसके पत्ते लंबे और कुछ गोलाई लिये होते हैं तथा जिसकी लकड़ी मजबूत किन्तु हल्की और सुगंधित होती है। इनके शंकु का आकार सनोबर (फ़र) से काफी मिलता-जुलता होता है। इनका मूलस्थान पश्चिमी हिमालय के पर्वतों तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में है, (१५००-३२०० मीटर तक हिमालय में तथा १०००-२००० मीटर तक भूमध्य सागरीय क्षेत्र में)।[1]यह इमारतों में काम आती है।[2] यह पश्चिमी हिमालय, पूर्वी अफगानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, उत्तर-मध्य भारत के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर तथा दक्षिण-पश्चिमी तिब्बत एवं पश्चिमी नेपाल में १५००-३२०० मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह एक शंकुधारी वृक्ष होता है, जिसकी ऊंचाई ४०-५० मी. तक और कभी-कभार ६० मी. तक होती है। इसके तने २ मीटर तक और खास वृक्षों में ३ मीटर तक के होते हैं।[1] इसकी कुछ प्रजातियों को स्निग्धदारु और काष्ठदारु के नाम से भी जाना जाता है। स्निग्ध देवदारु की लकड़ी और तेल दवा बनाने के काम में भी आते हैं। इसके अन्य नामों में देवदारु प्रसिद्ध है। यह निचले पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है।[3]

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टिंडे की खेती

Thu, 04/26/2018 - 01:00

 टिंडा की उन्नत खेती

 

टिन्डा भी कुकरविटेसी परिवार की मुख्य फसलों में से है जो कि गर्मियों की सब्जियों में से प्रसिद्ध है । इसको पश्चिमी भारतवर्ष में बहुत पैदा किया जाता है । टिन्डा भारत के कुछ भागों में अधिक पैदा किया जाता है । जैसे-पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में मुख्य रूप से इसकी खेती की जाती है । टिन्डे के फलों को अधिकतर सब्जी बनाने के रूप में प्रयोग किया जाता है । सब्जी अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर भी बनायी जाती है । कच्चे फलों को दाल आदि में मिलाकर हरी सब्जी के रूप में खाया जाता है । इस प्रकार से इस फसल के फलों के प्रयोग से स्वास्थ्य के लिये अधिक पोषक-तत्व-युक्त सब्जी मिलती है ।

 

टिन्डा की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

 

 फसल के लिये गर्मतर जलवायु अच्छी होती है । अधिक गर्म व ठन्डी जलवायु उपयुक्त नहीं होती है । बीज के अंकुरण के लिये फरवरी-मार्च का मौसम अच्छा होता है तथा भूमि सबसे अच्छी हल्की बलुई दोमट उपयुक्त पायी जाती है । भूमि में जल-निकास का भी उचित प्रबन्ध होना चाहिए । भूमि का पी. एच. मान  6.0 से 6.5 के बीच का उचित होता है ।

 

टिन्डा खेती के लिए तैयारी 

 

फसल के लिये मिट्‌टी ढेले रहित व भुरभुरी होनी चाहिए । इस प्रकार से 4-5 जुताई करनी चाहिए । अन्त में भूमि में खाद आदि मिलाकर बोने के योग्य बनाना चाहिए तथा खेत में मेड़-बन्दी करके क्यारियां बना लेनी चाहिए । क्यारियाँ अधिक बड़ी नहीं बनाना चाहिए ।

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