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Updated: 13 hours 24 min ago

नीबू की उन्नत खेती

Mon, 01/07/2019 - 05:00

नीबू  छोटा पेड़ अथवा सघन झाड़ीदार पौधा है। इसकी शाखाएँ काँटेदार, पत्तियाँ छोटी, डंठल पतला तथा पत्तीदार होता है। फूल की कली छोटी और मामूली रंगीन या बिल्कुल सफेद होती है। प्रारूपिक (टिपिकल) नीबू गोल या अंडाकार होता है। छिलका पतला होता है, जो गूदे से भली भाँति चिपका रहता है। पकने पर यह पीले रंग का या हरापन लिए हुए होता है। गूदा पांडुर हरा, अम्लीय तथा सुगंधित होता है। कोष रसयुक्त, सुंदर एवं चमकदार होते हैं।
बाग़ लगाने के लिए उचित दूरी पर 3 x 3 x 3 फीट आकर के गड्ढे खोद लिए जाते हैं. साधारणतः मौसम्बी संतरे के पौधे 5 x 4 मी. चकोतरे के 7 या 8 मी. एवं नींबू के 4-5 मी. दूरी पर लगाये जाते हैं. इन गड्ढों को मिट्टी के साथ 20-25 कि०ग्रा० गोबर की खाद मिलकर भर दिया जाता है. दीमक के प्रकोप से बचने हेतु प्रत्येक गड्ढे में 200 ग्राम क्लोरवीर की धुल डालें.

जो पौधे कलिकायन द्वारा तैयार किये जाते हैं वे लगभग एक साल में रोपाई योग्य हो जाते हैं, पौधे लगाने के लिए बरसात का मौसम अति उत्तम है. परन्तु मार्च एवं अप्रेल में भी पौधे सफलतापूर्वक लगाये जा सकते हैं.

पौधे लगाने से पहले प्रत्येक गड्ढे की मिट्टी में 20 कि०ग्रा० या एक टोकरी गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद और एक किलो सुपर फ़ॉस्फ़ेट मिलाना लें अच्छा रहता है. रोपाई के बाद नीचे लिखे अनुसार उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए.

पूरी तरह विकसित और फल देने वाले वृक्षों के लिए प्रति पेड़ 60 किग्रा गोबर की खाद, 2.5 किग्रा. अमोनियम सल्फ़ेट, 2.5 किग्रा. सुपर फास्फेट और 1.5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का प्रयोग करना चाहिए. उर्वरकों की उपरोक्त मात्र का उपयोग दो बराबर खुराकों में करें. पहली खुराक जनवरी से पहले दें, और दूसरी फल आने के बाद. दोनों बार उर्वरक देने के बाद सिंचाई करें. गोबर की खाद नवम्बर - दिसम्बर के महीनों में डालनी चाहिए.

सिंचाई

रोपाई के तुंरत बाद बाग़ की सिंचाई करें. छोटे पौधों 5 साल तक के पौधों की सिंचाई उनके आस-पास घेरा बनाकर की जा सकती है. जब कि पुराने पौधों के आस-पास पानी भरकर या नालियाँ बनाकर सिंचाई की जाती है. गर्मियों के मौसम में हर 10 या 15 दिन के अंतर पर और सर्दियों के मौसम में प्रति 4 सप्ताह बाद सिंचाई करनी चाहिए. बरसात के मौसम में सिंचाई की यदाकदा ही आवश्यकता होती है. इस मौसम में बरसात का अतिरिक्त पानी निकालने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए. सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि सिंचाई का पानी पेड़ के मुख्य तने के संपर्क में न आए. इसके लिए मुख्य तने के आसपास मिट्टी की एक छोटी मंद बनायीं जा सकती है. ड्रिप सिचाई विधि सबसे अच्छी रहती है. इसके द्वारा पानी की बचत उर्वरको का उपयोग होता है, साथ बीमीरा कम आती है.

निराई - गुड़ाई

नींबू जाति के फलों वाले बागों को कभी भी गहरा नहीं जोता जान चाहिए. क्योंकि इन पेड़ों की जड़ें ज़मीन की उपरी सतह में रहती हैं और गहरी जुताई करने से उनके नष्ट होने का खतरा रहता है. बागों में खरपतवारों की रोकथाम की जाए तो ज्यादा अच्छा है. प्रति हेक्टेअर 7.5-10 किलो तक सिमेंजिन या 2.5 लीटर ग्रेमेक्सोन को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़कने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तथा वार्षिक घासें नष्ट की जा सकती हैं.

पौधों की छंटाई

पौधों का अच्छा विकास हो इसके लिए उनकी छंटाई क्यारियों की अवस्था से ही शुरू हो जाती है. पौधे की लगभग सभी उपरी और बाहर निकलने वाली शाखाओं को काट दिया जाना चाहिए और इस प्रकार लगभग 45 से०मी० लम्बाई का साफ़ और सीधा तना ही रहने दिया जाना चाहिए. समय पर सभी रोग-ग्रस्त, टूटी हुई अनेकों शाखाओं वाली और सुखी लकडी वाली टहनियों को निकलते रहना चाहिए. जिस जगह पर कलि जोड़ी है उसके ठीक नीचे से निकलने वाली प्ररोहों को उनकी आरंभिक अवस्था में ही हवा देना चाहिए. जिन स्थानों पर शाखाएँ काटी गयी हों, वहां पर बोरोदोक्स नामक रसायन की लेई बना कर लगा दें. यह लेई एक कि०ग्रा० कॉपर सल्फ़ेट, 1.5 कि०ग्रा० बुझा चुना, और 1.5 लीटर पानी को मिलकर तैयार की जा सकती है.

उन्नत तरीके से करे गन्ने की खेती

Sun, 01/06/2019 - 05:00

 भारत में गन्ने की खेती काफी बड़े स्तर पर की जाती है। इस लेख में आप जानेंगे कि किस तरह कम लागत में गन्ने की खेती कर आप अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।गन्ने की फसल को अच्छे से बढ़ने के लिए अधिक समय के लिए गर्म और नमी युक्त मौसम का होना आवश्यक है, साथ ही गन्ने के लिए अधिक बारिश का होना भी आवश्यक है। गन्ने की फसल की बुआई के लिए तापमान 25 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेट होना बेहतर रहता है।  गन्ने की फसल की बुवाई के लिए अक्टूबर से नवंबर का महीना उपयुक्त रहता है, लेकिन फरवरी से मार्च के महीने में भी गन्ने की खेती की जा सकती है। गन्ने की फसल से अधिक वजन पाने के लिए 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सर्वोत्तम रहता हैं।

अगर आप भी  वैज्ञानिक तरीके से गन्ने की खेती करने के बारे में सोच रहे है तो आपके लिए यह लेख आप ही के लिए है। भारत में गन्ने की खेती काफी बड़े स्तर पर की जाती है।

भारत सरकार भी गन्ने की न्यूनतम बिक्री मूल्य में समय समय पर बढ़ोतरी करती रहती है ताकि किसान भाइयों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य प्राप्त हो सके। गन्ने की फसल की पैदावार कम लागत में करने के लिए खेत की तैयारी करना, जलवायु और खाद देने के समय के बारे में विस्तृत जानकारियां पढ़ने के लिए आगे पढ़ते रहें!

गन्ने की खेती इस प्रकार करे 

यदि आपके पास 1 एकड़ या उससे अधिक खेती योग्य जमीन है तो आप गन्ने की खेती से अच्छा मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। गन्ने को उगाना काफी आसान है और अच्छी पैदावार के द्वारा इससे अच्छा लाभ भी प्राप्त होता है

भूमि और खेत का चुनाव इस प्रकार करे 
गन्ने की खेती के लिए कृषि विशेषज्ञ और वैज्ञानिक गहरी दोमट मिट्टी को सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं। गन्ना उगाने के लिए आपको जुताई 40 सेमी से 60 सेंटी मीटर करनी चाहिए क्योंकि गन्ने की 75% जड़ें इसी गहराई पर पायी जाती हैं। खेती की शुरुआत करने पर आपको सबसे पहले खेत की जुताई कर जमीं को भुरभुरा बना लें और फिर उस पर पाटा चला कर उसे एक सरीखा समतल कर लें। खेत में जुटे से पहले 10-15 टन गे के सड़े गोबर की खाद को जमीन में खेत में फैला दें यह खाद जमीन को गन्ने के लिए काफी उर्वरक बना देगी। खरपतवार गन्ना ही नहीं किसी भी फसल के लिए काफी नुकसान दायक होती है अतः उसे सही समय परहटा दें।

गन्ने की बुवाई के समय उपयुक्त जलवायु का होना  

गन्ने की फसल को अच्छे से बढ़ने के लिए अधिक समय के लिए गर्म और नमी युक्त मौसम का होना आवश्यक है, साथ ही गन्ने के लिए अधिक बारिश का होना भी आवश्यक है। गन्ने की फसल की बुआई के लिए तापमान 25 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेट होना बेहतर रहता है।  गन्ने की फसल की बुवाई के लिए अक्टूबर से नवंबर का महीना उपयुक्त रहता है, लेकिन फरवरी से मार्च के महीने में भी गन्ने की खेती की जा सकती है। गन्ने की फसल से अधिक वजन पाने के लिए 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सर्वोत्तम रहता हैं।

सिंचाई और जल के प्रबंधन 

गन्ने की खेती के लिए गर्म मौसम में 10-10 दिनों के अंतराल और सर्दी के दिनों में 20- 20 दिनों के अंतराल पर खेत की सिंचाई करनी चाहिए। फवाड़ा विधि से पानी की सिंचाई करने से गन्ने की पैदावार में बढ़ोतरी होती हैं साथ ही इससे पानी की भी बचत होती हैं। गन्ने की फसल को लगाने के बाद 10 से 15 दिनों के भीतर खेत पर बनी मिट्टी की पपड़ी को तोड़ना आवश्यक है इस बात का अवश्य ध्यान रखें। ऐसा करने पर गन्ना आसानी से अंकुरित होता है एयर खरपतवार भी कम पनपती हैं। गन्ने की फसल की कुछ लंबाई बढ़ने के बाद उसे गिरने से बचाने के लिए गुड़ाई करने के बाद गन्ने के चारों तरफ दो बार मिट्टी अवश्य डालें और गन्ने के पत्तो को आपस में बांध दें।

गन्ने की फसल में खाद का प्रयोग इस प्रकार 

गन्ने की अधिक उत्पादन के लिए प्रति हेक्टर 300 किग्रा. नाइट्रोजन (nitrogen), 80 किग्रा.  फॉस्फोरस (Phosphorus) और 60 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है । नाइट्रोजन को तीन बराबर भागों में बाँट लें। जिसमें से 100 किग्रा. अंकुरण के समय या बुवाई के 30 दिन बाद, अगले 100 किग्रा. क्रमशः बुवाई के 90 और 120 दिनों बाद खेत में दाल दें। फॉस्फोरस (Phosphorus) और 60 किग्रा. पोटाश (potash) की साडी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में दाल दें।   की अधिक उत्पादन के लिए प्रति हेक्टर 300 किग्रा. नाइट्रोजन (nitrogen), 80 किग्रा.  फॉस्फोरस (Phosphorus) और 60 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है । नाइट्रोजन को तीन बराबर भागों में बाँट लें। जिसमें से 100 किग्रा. अंकुरण के समय या बुवाई के 30 दिन बाद, अगले 100 किग्रा. क्रमशः बुवाई के 90 और 120 दिनों बाद खेत में दाल दें। फॉस्फोरस (Phosphorus) और 60 किग्रा. पोटाश (potash) की साडी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में दाल दें

गन्ने की फसल को कीटों और बीमारी से बचना 

गन्ने के बीजों को नमी युक्त गर्म हवा से उपचारित करने पर वे संक्रमण रहित हो जाते हैं। फसल को बिमारियों से बचाने के लिए 600 ग्राम डायथेम एम. 45 को 250 लीटर पानी के घोल में 5 से 10 मिनट तक डुबा कर रखना चाहिए। गन्ने का रस चुसने वाले कीड़ो का असर इस फसल पर काफी अधिक रहता हैं इससे फसल को बचाने के लिए इस घोल में 500 मिली (ml) मिलेथियान भी घोल में मिलाएं।

गन्ने की फसल के  टुकड़ो के रूप में खेल में लगाने से पहले उसके डंडे के सिरे को मिट्टी के तेल और कोलतार के डूबा कर उपचारित करने से गन्ने में दीमक लगने की संभावना काफी कम रह जाती हैं। 
गन्ने की फसल से जुड़े किसी भी सवाल के लिए आप नीचे दिए कमेंट बॉक्स में हमें पूछ सकते हैं।

 

 

Category: खेती

आलू की खेती की उन्‍नत विधि

Sat, 01/05/2019 - 05:00

आलू भारत की सबसे महत्‍वपूर्ण फसल है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडकर आलू सारे देश में उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्‍टेयर है जो विश्‍व औसत से काफी कम है। अन्‍य फसलों की तरह आलू की अच्‍छी पैदावार के लिए उन्‍नत किस्‍मों के रोग रहित बीजो की उपलब्‍धता बहुत आवश्‍यक है। इसके अलावा उर्वरकों का उपयोग, सिंचाई की व्‍यवस्‍था, तथा रोग नियंत्रण के लिए दवा के प्रयोग का भी उपज पर गहरा प्रभाव पडता है।

भूमि एवं जलवायू सम्‍बंधी आवश्‍यकताऐं :

आलू की खेती के लिए जीवांश युक्‍त बलूई-दोमट मिट्टी ही अच्‍छी होती है। भूमि में जलनिकासी की अच्‍छी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए । आलू के लिए क्षारीय तथा जल भराव अथवा खडे पानी वाली भूमि कभी ना चुने। बढवार के समय आलू को मध्‍यम शीत की आवश्‍यकता होती है। 

आलू की खेती के लिए उन्‍नत किस्‍म का बीज :

आलू की काश्‍त में सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि इसका बीज अच्‍छी श्रेणी का हो। अच्‍छे बीज विशेषकर रोगाणूमुक्‍त बीज का प्रयोग करके आलू की पैदावार बढाई जा सकती है। अच्‍छी उपज के लिए जलवायू खण्‍ड या क्षेत्र के अनुसार केवल सिफारिश की गई उपयुक्‍त किस्‍में ही चुने। 

उपयुक्‍त माप के बीज का चुनाव :

आलू के बीज का आकार और उसकी उपज से लाभ का आपस मे गहरा सम्‍बंध है। बडे माप के बीजों से उपज तो अधिक होती है परन्‍तु बीज की कीमत अधिक होने से पर्याप्‍त लाभ नही होता। बहूत छोटे माप का बीज सस्‍ता होगा परन्‍तु रोगाणुयुक्‍त आलू पैदा होने का खतरा बढ जाता है। प्राय: देखा गया है कि रोगयुक्‍त फसल में छोटै माप के बीजो का अनुपात अधिक होता है। इसलिए अच्‍छे लाभ के लिए 3 से.मी. से 3.5 से.मी.आकार या 30-40 ग्राम भार के आलूओंको ही बीज के रूप में बोना चाहिए। 

आलू बुआई का समय एवं बीज की मात्रा :

उत्‍तर भारत में, जहॉ पाला पडना आम बात है, आलू को बढने के लिए कम समय मिलता है। अगेती बुआई से बढवार के लिए लम्‍बा समय तो मिल जाता है परन्‍तु उपज अधिक नही होती क्‍योंकि ऐसी अगेती फसल में बढवार व कन्‍द का बनना प्रतिकूल तापमान मे होता है साथ ही बीजों के अपूर्ण अंकुरण व सडन का खतरा भी बना रहता है। अत: उत्‍तर भारत मे आलू की बुआई इस प्रकार करें कि आलू दिसम्‍बर के अंत तक पूरा बन जाऐ। उत्‍तर-पश्चिमी भागों मे आलू की बुआई का उपयुक्‍त समय अक्‍तूबर माह का पहला पखवाडा है। पूर्वी भारत में आलू अक्‍तूबर के मध्‍य से जनवरी तक बोया जाती है। 

आलू की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 50 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. होनी चाहिए। इसके लिए 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हैक्‍टेयर पर्याप्‍त होता है।

आलू बुआई की विधि :

पौधों में कम फासला रखने से रोशनी,पानी और पोषक तत्‍वों के लिए उनमें होड बढ जाती है फलस्‍वरूप छोटे माप के आलू पैदा होते हैं। अधिक फासला रखने से प्रति हैक्‍टेयर में पौधो की संख्‍या कम हो जाती है जिससे आलू का मान तो बढ जाता है परन्‍तु उपज घट जाती है। इसलिए कतारों और पौधो की दूरी में ऐसा संतुलन बनाना होता है कि न उपज कम हो और न आलू की माप कम हो। उचित माप के बीज के लिए पंक्तियों मे 50 से.मी. का अन्‍तर व पौधों में 20 से 25 से.मी. की दूरी रखनी चाहिए। 

उर्वकों का प्रयोग:

फसल में प्रमुख तत्‍व अर्थात नत्रजन, फास्‍फोरस व पोटाश पर्याप्‍त मात्रा में डालें। नत्रजन से फसल की वानस्‍पतिक बढवार अधिक होती है और पौधे के कंदमूल के आकार में भी वृद्धि होती है परन्‍तु उपज की वृद्धि में कंदमूल के अलावा उनकी संख्‍या का अधिक प्रभाव पडता है। फसल के आरम्भिक विकास और वानस्‍पतिक भागों को शक्तिशाली बनाने में पोटाश सहायक होता है। इससे कंद के आकार व संख्‍या मे बढोतरी होती है। आलू की फसल में प्रति हैक्‍टेयर 120 कि.ग्रा. नत्रजन, 80 कि.ग्रा. फास्‍फोरस और 80 कि.ग्रा. पोटाश डालनी चाहिए। उर्वरकों की मात्राा मिट्टी की जांच के आधार पर निर्धारित करते है। बुआई के समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्‍फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा डालनी चाहिए।नत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधों की लम्‍बाई 15 से 20 से.मी. होने पर पहली मिट्टी चढाते समय देनी चाहिए। 

आलू में सिंचाई :

आलू में हल्‍की लेकिन कई सिंचाईयों की आवश्‍यकता होती है परन्‍तु खेत में पानी कभी भी भरा हुआ नही रहना चाहिए। खूडों या नालियों में मेढों की उंचाई के तीन चौथाई से अधिक उंचा पानी नही भरना चाहिए। पहली सिंचाई अधिकांश पौधे उगजाने के बाद करें व दूसरी सिंचाई उसके 15 दिन बाद आलू बनने व फूलने की अवस्‍था में करनी चाहिए। कंदमूल बनने व फूलने के समय पानी की कमी का उपज पर बुरा प्रभाव पडता है। इन अवस्‍थाओं में पानी 10 से 12 दिन के अन्‍तर पर दिया जाना चाहिये । पूर्वी भारत में अक्‍तूबर के मध्‍य से जनवरी तक बोई जाने वाली आलू की फसल मे सिंचाई की उपयुक्‍त मात्रा 50 से.मी. ( 6 से 7 सिंचाइयॉ) होती है। 

आलू में खरपतवारों की रोकथाम :

आलू की फसल में कभी भी खरपतवार न उगने दें। खरपतवार की प्रभावशाली रोकथाम के लिए बुआई के 7 दिनों के अन्‍दर, 0.5 किलोग्राम सिमैजिन 50 डब्‍ल्‍यू.पी. (Cizamin 50 w.p.) या लिन्‍यूरोन (Linuron) का 700 लिटर पानी मे घोल बनाकर प्रति हैक्‍टेयर के हिसाब से छिडकाव कर दें। 

आलू कटाई या खुदाई:

पूरी तरह से पकी आलू की फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जव आलू के कन्‍दो के छिलके सख्‍त पड जायें। पूर्णतया पकी एवं अच्‍छी फसल से लगभग 300 क्विंटल प्रति हैक्‍टेयर उपज प्राइज़ होती है। 

आलू की फसल में कीट पतगें, सुत्रकृमि तथा बीमारीयॉ:

आलू की फसल में कंद वाले शलभ (Tubber Moth), कटुवा कीडे, जैसिड (Jassid) और माहू या चेंपा (Afid) से बहुत नुकसान होता है। 

टयूबर मॉथ कीडे के लारवा कंदमूल मे सुराख बना देते हैं। यदि कंद को मिट्टी से ढका न गया तो ये कीडे फसल को बहुत नुकसान पंहुचाते है। कंद वाले शलभ जैसे ही दिखाई दें इन पर 0.07 प्रतिशत ऐन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव करें और कंद को मिट्टी से ढक दें। 

कटुवा कीडे पौधों का उनकी जडों के पास, भूमि के निचे ही काट देते हैं। इनकी रोकथाम के लिए बुआई से पहले 5 प्रतिशत एल्ड्रिन या हैप्‍टाक्‍लोर 20 से 25 किलोग्राम प्रति हैक्‍टेयर की दर से खेत की मिट्टी में मिलाऐं। खडी फसल में कटुवा का प्रकोप होने पर उपरोक्‍त दवा का बुरकाव पौधों की निचली सतह पर करते है। 

जैसिड नर्म शरीर वाले हरे रंग के कीडे होते हैं जो पौधों के पत्‍तों और अन्‍य कोमल भागों का रस चूस लेते हैं। 

माहू या चेंपा ( एफिड): आलू में लगने वाले हरे रंग के किडे होते हैं जो पत्‍ती की निचली सतह पर पाए जाते हैं और पत्‍तों का रस चूसते हैं। इनके कुप्रभाव से प‍त्तियां उपर को मुड जाती हैं और उनकी बढवार रूक जाती है। माहू या चेंपा लगने पर 0.07 प्रतिशत ऐन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव करें। 

जड गांठ सुत्रकृमि (Root Knote Nematode) प्रभावित पौधें की पत्तियां सामान्‍य पौधों की पत्तियों से बडी हो जाती हैं पौधों की बढवार रूक जाती है तथा गर्म मौसम में रोगी पौधे सूख जाते हैं। जडों मे अत्‍यधिक गॉठे हो जाती हैं। जडों की दरारों में प्राय दूसरे सूक्ष्‍मजीव जैसे फफूंद, जीवाणू आदि का आक्रमण होता है। बचाव के लिए फसल चक्र में मोटे अनाज वाली फसलों को लाना चाहिए। ग्रीटिंग्स ऋतु में 2-3 बार जुताई करनी चाहिए । बुआई से पहले एल्‍डीकार्ब, कार्बोफ्यूरान का 2 किलोग्राम सक्रिय भाग प्रति हैक्‍टेअर की दर से खेत में डालना चाहिए। 

आलू की फसल मे अनेक बीमारीयॉ जैसे झुलसा, पत्‍ती मुडना व मोजेक आदि लगती हैं। इन बीमारियों से फसल को बहुत नुकसान होता है। इनसे फसल को बचाना बहुत आवश्‍यक जरूरी है।

Authors:

R. Verma & Sunil Kumar

Technical Officer, IARI

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अति महत्त्वपूर्ण जानकारी::-

Fri, 01/04/2019 - 05:00

पौधे भी इंसानों की तरह विकास करने के लिए पोषक तत्व का उपयोग करते हैं ,पौधों को अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । इन पोषक तत्वों के उपलब्ध न होने पर पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधों की मृत्यु हो जाती है । हालाकी पौधेभूमि से जल तथा खनिज-लवण शोषित करके वायु से कार्बनडाई-आक्साइड प्राप्त करके सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। पौधों को 17 तत्वों की आवश्यकता होती है जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं।
इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन , नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। इनमें से प्रथम तीन तत्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण कर लेते हैं।

पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है:-

*.मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।

*.गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।

*.सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।

पौधों मे आवश्यक महत्पूर्ण पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण:-

नत्रजन(N):-
नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है, जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है। यह पर्ण हरित के निर्माण में भी भागलेती है।नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है:
*.यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है ।
*.वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है ।
*.अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है ।
*.यह दानो के बनने में मदद करता है
*.सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ति की वृद्दि और विकास में सहायक है।
*.क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।
*.पत्ती वाली सब्जियों की गुणवत्ता में सुधार करता है।

नत्रजन-कमी के लक्षण:-
*.पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना । निचली पत्तियाँ पड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं।
*.पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना।
*.फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना।

फॉस्फोरस(P):-

*.फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स वफाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
*.यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है।
*.फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदाहोता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढती है.
*.फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुद्दढ़ होती हैं । पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती हैं।
*.इससे फल शीघ्र आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने शीघ्र पकते हैं।
*.यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है।
*.पौधों के वर्धनशील अग्रभाग, बीज और फलों के विकास हेतु आवश्यक है। पुष्प विकास में सहायकहै।
*.कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है। जड़ों के विकास में सहायक होता है।
*.न्यूक्लिक अम्लों, प्रोटीन, फास्फोलिपिड और सहविकारों का अवयव है।
*.अमीनों अम्लों का अवयव है।

फॉस्फोरस-कमी के लक्षण:-

*.पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्काबैगनी या भूरा हो जाता है।फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं।
*.दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं ।
*.पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होताहै कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं 
*अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीजका निर्माण सही न होना।
*.इसकी कमी से आलू की पत्तियाँ प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।

पोटैशियम(K):-

*.जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
*.स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
*.अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है । आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है । सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है । मृदामें नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है।
*.एंजाइमों की क्रियाशीलता बढाता है।
*.ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है, जिससे पौधों में ठण्डक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
*.कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण, प्रोटीन संश्लेषण और इनकी स्थिरता बनाये रखने में मददकरता है।
*.पौधों की रोग प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि होती है।
*.इसके उपयोग से दाने आकार में बड़े हो जाते है और फलों और सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

पोटैशियम-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं।
*.पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़तेहैं।
*.इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है!
*पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है।

कैल्सियम calcium (Ca):-

*.यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है।
*.यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है।
*.यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
*.कोशिका भित्ति का एक प्रमुख अवयव है, जो कि सामान्य कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक होता है।
*.कोशिका झिल्ली की स्थिरता बनाये रखने में सहायक होता है।
*.एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
*.पौधों में जैविक अम्लों को उदासीन बनाकर उनकेविषाक्त प्रभाव को समाप्त करता है।
*.-कार्बोहाइट्रेड के स्थानांतरण में मदद करता है !

कैल्सियम-कमी के लक्षण:-

*.नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना।
*.जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना।
*.फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना।

मैग्नीशियम magnesium (Mg):-*

*.क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है।
*.पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
*.पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है।
*.चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।
*.क्लोरोफिल का प्रमुख तत्व है, जिसके बिना प्रकाश संश्लेषण (भोजन निर्माण) संभव नहीं है।
*.कार्बोहाइट्रेड-उपापचय, न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण आदि में भाग लेने वाले अनेक एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
*.फास्फोरस के अवशोषण और स्थानांतरण में वृद्दि करता है।

मैग्नीशियम-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियाँ आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं।
*.दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना।

गन्धक (सल्फर) sulfur (S):-

*.यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
*.विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
*.यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये आवश्यक है। तम्बाकू की पैदावार 15-30प्रतिशत तक बढ़ती है।
*.प्रोटीन संरचना को स्थिर रखने में सहायता करता है।
*.तेल संश्लेषण और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करता है।
*विटामिन के उपापचय क्रिया में योगदान करता है।

गन्धक-कमी के लक्षण:-

*.नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
*.मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
*.ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाता हैं।

लोहा (आयरन) iron (Fe):-

*.लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
*.क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
*.यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।
*.पौधों में क्लोरोफिल के संश्लेषण और रख रखाव के लिए आवश्यक होता है।
*.न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।
*.अनेक एंजाइमों का आवश्यक अवयव है।

लोहा-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
*.नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
*.धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।

जस्ता (जिंक) zinc (Zn):-

*.कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है!
*.हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
*.यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज,डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*.पौधों द्वारा फास्फोरस और नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक होता है!
*न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन-संश्लेषण में मदद करता है।
*.हार्मोनों के जैव संश्लेषण में योगदान करता है।
*.अनेक प्रकार के खनिज एंजाइमों का आवश्यक अंग है।

जस्ता-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
*.गेहूँ में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
*.फलों का आकार छोटा व बीज कीपैदावार का कम होना।
*.मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
*.धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।

ताँबा (कॉपर ) copper (Cu):-

*.यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
*.ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
*.अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।
*.पौधों में विटामिन ‘ए’ के निर्माण में वृद्दि करता है।
*.अनेक एंजाइमों का घटक है।

ताँबा-कमी के लक्षण:-

*.फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
*.अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों मेंरिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।

बोरान boron (B):-

*.पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
*.दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
*.यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
*.यह डी.एन.ए., आर.एन.ए., ए.टी.पी. पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है।
*.प्रोटीन-संश्लेषण के लिये आवश्यक है।
*.कोशिका –विभाजन को प्रभावित करता है।
*.कैल्शियम के अवशोषण और पौधों द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करता है।
*.कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाता है!

बोरान-कमी के लक्षण:-

*.पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
*.पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
*.बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप- सिकनेस नामक बीमारी का लगना।

मैंगनीज manganese (Mn):-

*.क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
*.पौधों में आॅक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*.प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
*.प्रकाश और अन्धेरे की अवस्था में पादप कोशिकाओं में होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
*.नाइट्रोजन के उपापचय और क्लोरोफिल के संश्लेषण में भाग लेने वाले एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है।
*.पौधों में होने वाली अनेक महत्वपूर्ण एंजाइमयुक्त और कोशिकीय प्रतिक्रियओं के संचालन में सहायक है।
*.कार्बोहाइट्रेड के आक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बन आक्साइड और जल का निर्माण करता है।

मैंगनीज-कमी के लक्षण:-

*.पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
*.अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोगपैदा होता है।
*.जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।

क्लोरीन chloride (Cl):-

*.यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
*.पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमताको बढ़ाता है।

क्लोरीन-कमी के लक्षण:-

*.गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
*.कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
*.पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।

मालिब्डेनम molybdenum (Mo):-

*.यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
*.यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
*.पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।

मालिब्डेनम-कमी के लक्षण:-

*.सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं!
*.पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
*.टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जातेहैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
*.इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
*.नीबू जाति के पौधो में माॅलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता हैं।

अंत मे-
हम सभी किसान भाइयों से यही कहना चाहते है की इन सभी तत्वों की कमी तथा लक्षण आपको हमने आपको सविस्तार बता दिया है!इसे आप अपनी सुविधानूसार खेती की व्यक्तिगत डायरी या रजिस्टर मे भी लिख सकते हो!!

धन्यवाद.....

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टमाटर की पौध तैयार करना

Fri, 01/04/2019 - 05:00

पौध तैयार करने के लिये जमीन की सतह से 15 से 20 सेन्टी मीटर ऊचाई की क्यारी बनाकर इसमे बीज की बुवाई करते है। बीज की बुवाई करते समय बीज को मिट्टी मे ढेड से दो सेन्टीमीटर गहराई मे लगाते है तथा पक्तियों में बुवाई करते है। बीज की बुवाई के बाद क्यारी की ऊपरी सतह पर सडी हुई गोबर की खाद की पतली परत डालते है। तेज धूप, बरसात व ठंड से बचाने के लिए घास फूस से क्यारी को ढक देते है।  पूर्ण रूप से बीज अंकुरित हो जाने पर घास फूस हटा देना चाहिये।

पौध की रोपाई

जब पौध पांच से छः पत्ती की हो जाए तो इसे 60 सेन्टी मीटर चाौडी तथा जमीन की सतह से 20 सेन्टी मीटर ऊंची उठी हुई क्यारिया बनाकर इन पर रोपाई करते है। क्यारियो के दोनो तरफ 20 सेन्टी मीटर चैडी नालिया बनाते है। क्यारियो पर पौध की रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टी मीटर रखते है।

खेत की सिचांई

किसान भाईयो टमाटर की फसल के लिये पहली सिचांई पौध रोपई के बाद की जाती है। इसके बाद फसल की आवश्यकता अनुसार समय-समय पर सिचांई करते रहना चाहिये।

खर पतवार नियन्त्रण तथा निराई-गुडाई

टमाटर क् अच्छे उत्पादन के लिए समय-समय पर निराई-गुडाई करना चाहिये।
पहली निराई पौध रोपण के 20 दिन बाद करे। तथा दूसरी निराई पौध रोपण के 40 दिन बाद करना चाहिये।

फसल सुरक्षा तथा रोग से बचाव

किसान भाईये टमाटर की फसल मे लगने वाले रोग तथा उनका बचाव निम्न प्रकार है।

आद्र गलन ‘‘ डैम्पिंक आफ → आद्र गलन टमाटर की फसल का प्रमुख रोग है। इसके बचाव के लिए बीज को बुवाई से पूर्व कैपटाम व धीरम से उपचारित करना चाहिये। अगैती झुलसा- कापर आक्सी क्लोराइड की तीन ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर झिडकाव करना चाहिये।

पत्ती मोड विषाणु रोग→ पत्ती मोड विषाणु रोग मे सर्वप्रथम रोग ग्रस्त पौधे को उखाड कर जला देना चाहिये तथा मोनोक्रोटोफास दवा की दो मिली ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चाहिये।

टमाटर की प्रमुख प्रजातियां

काशी अमृत,काशी अनुपम,पूसा,स्र्वण वैभव,अविनाश-2 ,रूपाली आदि उपज- 500 से 700 कुन्तल प्रति हेक्टेयर बीज दर- 300 से 450 ग्राम प्रति हेक्टेयर 
फसल तैयार होने की अवधि → लगभग60 से 90 दिन मे टमाटर की फसल तैयार हो जाती है। जिसके के बाद किसान भाई फलो की तुडाई शुरू कर देते है।

Tags: हाइब्रिड टमाटर की खेतीटमाटर की खेती कब करेटमाटर की किस्मअर्क रक्षक टमाटर की खेतीटमाटर की जैविक खेतीटमाटर के बीजचेरी टमाटर की खेतीटमाटर के रोगCategory: खेती

ड्रेगन फ्रूट से होने वाले स्वास्थ्य लाभ

Thu, 01/03/2019 - 05:00

आम तौर पर ड्रेगन फ्रूट थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में लोकप्रिय है। बाजार में 200 रु से 250 रु तक दाम मिलने की वजह से हाल के दिनों में भारत में भी इसकी खेती का प्रचलन बढ़ा है। कम वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। ड्रेगन फ्रूट के पौधे का उपयोग सजावटी पौधे के साथ साथ ड्रेगन फ्रूट उपजाने के लिए होता है। ड्रेगन फ्रूट को ताजे फल के तौर पर खा सकते हैं साथ ही इस फल से जैम, आइस क्रीम, जैली, जूस और वाइन भी बना सकते हैं। सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी इसे फेस पैक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

यही नहीं ड्रेगन फ्रूट व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक है। यही वजह है कि इसकी लोकप्रियता ज्यादा है।

ड्रेगन फ्रूट से होने वाले स्वास्थ्य लाभ –

ड्रेगन फ्रूट से मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद मिली है
कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक है
इस फ्रूट में वसा और प्रोटीन अधिक मात्रा में पाए जाते हैं
इसे एंटीआक्सीडेंट का उत्तम स्त्रोत माना जाता है
अर्थेराइटिस की बीमारी से बचाता है
हृदय रोगियों के लिए उत्तम आहार
वजन नियंत्रित करने में सहायक
बुढ़ापे का असर कम करता है
अस्थमा से लड़ने में मदद करता है
विटामीन & खनीज का उत्तम स्त्रोत
ड्रेगेन फ्रूट के प्रकार : तीन प्रकार के ड्रेगन फ्रूट होते हैं।

सफेद रंग के गुदे वाला लाल रंग का फल
लाल रंग के गुदे वाला लाल रंग का फल
सफेद रेग के गुदे वाला पीले रंग का फल

ड्रेगन फ्रूट की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु :

इसके पौधे कम उपजाऊ मिट्टी और तापमान में होने वाले लगातार परिवर्तनों के बीच भी जीवित रह सकते हैं। इसके लिए 50 सेमी वार्षिक औसत की दर से बारिश की जरूरत होती है जबकि 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। बहुत ज्यादा सूर्य प्रकाश को इसकी खेती के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। सूरज की रौशनी जिन इलाके में ज्यादा हो उन इलाकों में बेहतर उपज के लिए छायादार जगह में इसकी खेती की जा सकती है।

उपयुक्त मिट्टी :

इस फल को रेतिली दोमट मिट्टी से लेकर दोमट मिट्टी तक नाना प्रकार के मिट्टियों में उपजाया जा सकता है। हालांकि बेहतर जिवाश्म और जल निकासी वाली बलुवाई मिट्टी इसकी उपज के लिए सबसे बेहतर है। ड्रेगन फ्रूट की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 7 तक उपयुक्त माना जाता है।

ड्रेगन फ्रूट के लिए खेत की तैयारी :

खेत की अच्छी तरह से जुताई की जानी चाहिए ताकि मिट्टी में मौजुद सारे खर पतवार खत्म हो जाएं। जुताई के बाद कोई भी जैविक कंपोस्ट अनुपातनुसार मिट्टी में दिया जाना चाहिए।

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में बुआई या पौधों को लगाने की विधि :

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में बुआई का सबसे सामान्य तरीका है काट कर लगाना। हालांकि बीज के जरिए भी इसकी बुआई की जा सकती है लेकिन चुंकि बीज पनपने में लंबा वक्त लगता है और मूल पेड़ के गुण उस पौधे में आए इसकी संभावना भी कम रहती है इसलिए इसे इसकी वाणिज्यिक खेती के अनुकूल नहीं माना जाता है। आपको गुणवत्ता पूर्ण पौधे की छंटाई से ही ड्रेगेन फ्रूट के सैंपल तैयार करने चाहिए। तकरीबन 20 सेमी लंबे सैंपल को खेत में लगाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इनको लगाने से पहले मूल पेड की छंटाई करके इनका ढेर बना लेना चाहिए। फिर इन पौधों को सुखे गोबर के साथ मिला कर मिट्टी बालू और गोबर के 1:1:2 के अनुपात में मिलाकर रोप देना चाहिए। ये जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन्हें रोपने से पहले इन्हें छाया में रखा जाए ताकि सूरज की तेज रोशनी ने इन सैपलिंग को नुकसान न पहुंचे। दो पौधों के रोपने की जगह में कम से कम 2 मीटर की खाली जगह छोड़ देनी चाहिए। पौधे को रोपने के लिए 60 सेमी गहरा, 60 सेमी चौड़ा गड्डा खोदा जाए। इन गड्डों में पौधों की रोपाई के बाद मिट्टी डालने के साथ साथ कंपोस्ट और 100 ग्राम सुपर फास्फेट भी डालना चाहिए। इस तरह से एक एकड़ खेत में ज्यादा से ज्यादा 1700 ड्रेगन फ्रूट के पौधे लगाए जाने चाहिए। इन पौधों को तेजी से बढ़ने में मदद करने के लिए इनके सपोर्ट के लिए लकडी का तख्त या कंक्रीट लगाया जा सकता है।

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में खाद एवं उर्वरक का इस्तेमाल :

ड्रेगेन फ्रूट के पौधों की वृद्धि के लिए जिवाश्म तत्व प्रमुख भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पौधे के सटिक वृद्धि के लिए 10 से 15 किलो जैविक कंपोस्ट/जैविक उर्वरक दिया जाना चाहिए। इसके बाद प्रत्येक साल दो किलो जैविक खाद की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए। इस फसल को समुचित विकास के लिए रासायनिक खाद की भी जरूरत पड़ती है। वानस्पतिक अवस्था में इसको लगने वाली रासायनिक खाद का अनुपात पोटाश:सुपर फास्फेट:यूरिया = 40:90:70 ग्राम प्रति पौधे होता है। जब पौधों में फल लगने का समय हो जाए तब कम मात्रा में नाइट्रोजन और अधिक मात्रा में पोटाश दिया जाना चाहिए ताकि उपज बेहतर हो। फूल आने से लेकर फल आने तक यानि की फुल आने के ठीक पहले (अप्रेल), फल आने के समय( जुलाई – अगस्त) और फल को तोड़ने के दौरान ( दिसंबर) तक में इस अनुपात में रासायनिक खाद दिया जाना चाहिए : यूरिया:सुपर फास्फेट:पोटाश =50ग्राम:50 ग्राम:100 ग्राम प्रति पौधे। रासायनिक खाद प्रत्येक साल 220 ग्राम बढ़ाया जाना चाहिए जिसे बढ़ाकर 1.5 किलो तक किया जा सकता है।

ड्रेगेन फ्रूट के खेती की खासियत ये है कि इसके पौधों में अब तक किसी तरह के कीट लगने या पौधों में किसी तरह की बीमारी होने का मामला सामने नहीं आया है। ड्रेगेन फ्रूट के पौधे एक साल में ही फल देने लगते हैं। पौधों में मई से जून के महीने में फूल लगते हैं और अगस्त से दिसंबर तक फल आते हैं।

फूल आने के एक महीने के बाद ड्रेगेन फ्रूट को तोड़ा जा सकता है। पौधों में दिसंबर महीने तक फल आते हैं। इस अवधि में एक पेड़ से कम से कम छह बार फल तोड़ा जा सकता है। फल तोड़ने लायक हुए हैं या नहीं इसको फलों के रंग से आसानी से समझा जा सकता है। कच्चे फलों का रंग गहरे हरे रंग का होता जबकि पकने पर इसका रंग लाल हो जाता है। रंग बदलने के तीन से चार दिन के अंदर फलों को तोड़ना उपयुक्त होता है लेकिन अगर फलों का निर्यात किया जाना हो तो रंग बदलने के एक दिन के भीतर ही इसे तोड़ लिया जाना चाहिए। इस तरह से प्रति एकड़ पांच से छह टन ड्रेगन फ्रूट का उत्पादन लिया जा सकता है।

कुल मिलाकर ड्रेगेन फ्रूट के पौष्टिक गुणों को देखते हुए स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी भारी मांग है। इसलिए ड्रेगेन फ्रूट की खेती व्यवसायिक तौर पर बड़ी लाभप्रद मानी जाती है।

 

 

साभार https://www.facebook.com/AgricultureHelplineHaryana/posts/1791452150884245

Category: खेतीGallery:  Sep 13 2017 0 ड्रेगन फ्रूट By villagedevelopment Gallery image: 

कुंदुरी की खेती

Wed, 01/02/2019 - 05:00

कुंदरू को गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है पहले इसे प. बंगाल और उ,प्र. के  पूर्वी जिलों में उगाया जाता था किन्तु अब इसे नई विधिया अपनाकर हर सिंचित क्षेत्र में सुगमता से उगाया जा सकता है कुंदरू की खेती उन सभी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है जहां पर औसत वार्षिक वर्षा १००-१५० से.मि. तक होती है |

भूमि :-

भूमि का चुनाव :-

इसे भारी भूमि छोड़कर किसी भी भूमि में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है चूँकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सह नहीं पाती है अत: उचे स्थानों पर जहां जल निकास की उचित व्यवस्था हो वहीँ पर इसकी खेती करनी चाहिए |

भूमि की तैयारी :-

यदि इसे ऊँची जमीन में लगाना है तो २-३ जुताइयां देशी हल से करके उसके बाद  पाटा लगा देना चाहिए १.५ मी.पंक्ति से पंक्ति की दुरी और १.५ मी. पौध से पौध की दुरी रखकर ३० से.मी. लम्बा और ३० से. मी. चौड़ा और ३० से.मी. गहरा गड्डा खोद लेना चाहिए मिटटी में ४-५ किलो ग्राम गोबर की खाद गड्डे में भर देना चाहिए |

प्रजातियाँ :-

कुंदरू की अभी तक कोई विकसित प्रजाति नहीं है केवल स्थानीय किस्मे ही उगाई जाती है इनके फलों के आकार के आधार पर दो प्रकार की किस्मे है |

गोल या अंडाकार वाली किस्मे :-

इस प्रकार की किस्मों के फलों का आकार अंडाकार होता है तथा फल हलके एवं पीले रंग के होते है |

लम्बे आकार वाली किस्मे :-

इस किस्म के फल आकार में अपेक्षाकृत बड़े और लम्बे होते है |

बीज बुवाई :-

पौध सामग्री :-

कुंदरू का प्रसारण भी परवल की तरह लता की कलमे काटकर किया जाता है इसके लिए सामान्यत: जुलाई के महीने में ४-५ माह से एक वर्ष पुरानी लताओं की ५-७ गांठ की १५-२० से. मी. लम्बी और आधे से.मी. मोटाई की कलमे काट ली जाती है  इन कलमों को जमीन में या गोबर की सड़ी हुई खाद तथा मिटटी मिलाकर भरे हुए पालीथीन के थैलों में लगा देते है इन कलमों की समय से सिचाई तथा देखभाल करते रहने से  लगाने के लगभग ५०-६० दिनों बाद कलमों की अच्छी तरह जड़े विकसित हो जाती है और उनमे कल्ले निकल आते है |

पौधरोपण का समय एवं विधि :-

सितम्बर-अक्टूम्बर के महीने में इसकी कलमों का रोपण किया जाता है इसके लिए पहले से तैयार की गई कलमों के पालीथीन को हटाकर मिटटी सहित गड्डे में रोपण करना चाहिए परवल जैसे कुंदरू भी नर और मादा पौधे अलग-अलग होते है अत: हर एक १० मादा पौधों के बिच एक नर पौधे की कलम लगाना आवश्यक़ होता है यदि गृह वाटिका में १-२ पौधे भी कुंदरू के लगाए जाए तो उनमे फलत के लिए एक नर पौधा अवश्य लगाया जाए |

आर्गनिक खाद :-

एक वर्ष का लगाया गया कुंदरू की लता २-३ वर्ष तक फलत में रहती है इसकी लताएँ ठण्ड के दिन में सुषुप्ता अवस्था में चली जाती है और बाद में फ़रवरी - मार्च के महीने में  इनसे नई शाखाएँ निकलती है इस समय प्रति थाला में १-२ किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुयी खाद, १ किलो ग्राम भू-पावर , १ किलो ग्राम माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट, १ किलो ग्राम माइक्रो नीम , १ किलो ग्राम सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट , १ किलो ग्राम माइक्रो भू-पावर और १-२ किलो ग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिटटी के साथ मिलाकर प्रति थाला में भर देना चाहिए |

सिचाई :-

कलमों का थाले में रोपण करने के बाद सिचाई की जाती है तथा बाद में आवश्यकता अनुसार सिचाई करते है ठण्ड के दिन में जब पौधे सुषुप्त अवस्था में रहते है तब सिचाई की विशेष आवश्यकता नही रहती है गर्मी के दिनों में ५-६ दिन के अन्तराल पर सिचाई की जानी चाहिए बरसात के दिनों में पौधों के पास पानी नहीं रुकना चाहिए अन्यथा पौधे सड़ना शुरू कर देते है |

 खरपतवार नियंत्रम :-

पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर निराई करना आवश्यक होता है थाले में जब भी खरपतवार उगे उन्हें खुरपी की सहायता से निकाल देना चाहिए पौधों के पास हलकी गुड़ाई करने से वायु संचार अच्छा होता है जिससे लताओं की बढ़वार शीघ्र और तेज होती है |

कीट नियंत्रण :-

कुंदरू  की फसल को बहुत से कीड़े-मकोड़े सताते है किन्तु फल की मक्खी और फली भ्रंग विशेष रूप से हानी पहुंचाते है |
फल की मक्खी :-

यह मक्खी फलों में छिद्र करती है और उनमे अंडे देती है जिसके कारण फल सड़ जाते है कभी -कभी यह मक्खी फूलों को हानी पहुंचाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

फली भ्रंग :-

यह धूसर रंग का गुबरैला होता है जो पतियों में छेद करके उन्हें हानी पहुंचाता है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

रोग नियंत्रण :-

कुंदरू में विशेष प्रकार से चूर्णी फफूंदी नामक रोग अधिक लगता है -

चूर्णी फफूंदी :-

यह रोग एक प्रकार की फफूंदी के कारण होता है जिसके कारण पत्तियों और तनों पर आटे के समान   फफूंदी जम जाती है और पत्तियां पीली पड़कर व मुरझाकर मर जाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

तुड़ाई :-

पहले पौधे मार्च-अप्रैल के महीने में फल आना शुरू होता है और मई से उपज मिलने लगती है जो अक्टूम्बर तक चलती है कुंदरू के पूर्ण रूप से विकसित होने पर कच्ची अवस्था में ही फलों की तुड़ाई करने पर फल सख्त हो जाते है और अन्दर का गुदा लाल हो जाता है जो सब्जी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है |

उपज :-

कुंदरू  की उपज इसकी प्रजातियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है लेकिन इसकी औसत उपज २४० क्विंटल प्रति हे. है |

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किन्नू की खेती

Tue, 01/01/2019 - 05:00

उत्तर भारत में नीम्बूवर्गीय फलों में किन्नू की खेती प्रमुख है | इसकी खेती हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व हिमाचल प्रदेश में की जाती है | किन्नू स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है | इसमें विटामिन सी के आलावा विटामिन ए, बी तथा खनिज तत्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं | किन्नू अधिक उत्पादन देने वाली नींबू वर्गीय फलों की संकर किस्म है | इसका रस खून बढ़ने , हड्डियों की मजबूती तथा पाचन में लाभकारी होता है | इसमें खटास व मिठास का अच्छा संतुलन होता है | फल जनवरी में पकता है | इसका उत्पादन 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ है | पौधे तैयार करना : पौधे लगाने का समय : गड्ढों में लगायें पौधे : उर्वरकों का उचित इस्तेमाल : कटाई - छंटाई : फलों को गिरने से बचाएं : कीड़े व उनसे बचाव : कैसे करें उपचार :

 

अच्छी आमदनी के चलते पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान किन्नू के रकबे में बढ़ोतरी कर रहे हैं। इन राज्यों के अद्र्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्रों में किन्नू का रकबा बढ़ रहा है। दक्षिणी राज्यों में किन्नू के फलते-फूलते बाजार से उत्तरी राज्यों के किसानों को इसका रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिला है। अनुमानों के मुताबिक इन तीनों राज्यों में किन्नू का रकबा करीब 4,000 हेक्टेयर है।

 

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कपास और गेहूं की खेती करने वाले किसान भी अच्छी आमदनी की वजह से किन्नू की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। किन्नू का रकबा हर साल पंजाब में 2,200 एकड़, हरियाणा में 1,100 एकड़ और राजस्थान में 700 एकड़ बढ़ रहा है। किन्नू के पेड़ों पर हर दूसरे साल फल लगते हैं, इसलिए चालू वर्ष ऑफ सीजन है। इस वजह से फल लगने की अवस्था वाले नए पौधों की संख्या में इजाफा होने के बावजूद उत्पादन पिछले साल से थोड़ा कम रह सकता है।

 

किसानों ने कहा कि पंजाब में कृषि शिक्षा की बेहतर व्यवस्था होने से उन्हें किन्नू का रकबा बढ़ाने में मदद मिली  है।  कम उत्पादन की वजह से पिछले साल की तुलना में किन्नू के दाम 10 फीसदी बढ़ सकते हैं। दक्षिण में खट्टे फलों की बड़ी मांग होती है। संतरा सितंबर माह तक उपलब्ध होता है। इसके बाद दो महीने तक माल्टा उपलब्ध रहता है। माल्टा का सीजन खत्म होने के बाद इसकी भरपाई किन्नू से होती है, जिसकी आवक दिसंबर में शुरू होती है और यह फरवरी तक उपलब्ध रहता है।

 

पंजाब के किन्नू उत्पादक क्षेत्रों (अबोहर, फाजिल्का और होशियारपुर) और हरियाणा के (सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी और झज्जर) के किसानों ने 3-4 वर्षों पहले आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के बाजार में अपनी उपज बेचनी शुरू की थी और अब वे अच्छा पैसा कमा रहे हैं।  पंजाब में बागवानी निदेशक और किन्नू के नोडल अधिकारी गुरकंवल सिंह सरोठा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि राज्य सरकार इस साल सिट्रस प्लांट को पूरी क्षमता पर चलाएगी, जिसमें छोटे आकार के किन्नू की खपत होगी। इससे बाजार में आपूर्ति कम पहुंचेगी, जिससे कीमतें बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के विविधिकरण मिशन के तहत किन्नू के रकबे में बढ़ोतरी पर जोर दिया जा रहा है। पंजाब में किन्नू की उत्पादकता 22 टन प्रति हेक्टेयर है।

 

हरियाणा में बागवानी विभाग के महानिदेशक अर्जन सिंह सैनी ने कहा कि किन्नू हरियाणा में पैदा होने वाला सबसे बड़ा रसदार फल है। इस फसल को धान की तुलना में कम सिंचाई की जरूरत होती है और आमदनी प्रति हेक्टेयर में 1 से 2 लाख रुपये तक होती है, जो कृषि प्रबंधन पर निर्भर करता है। इस वजह से किसान खाद्यान्न के साथ ही किन्नू उत्पादन में भी आगे आ रहे हैं। खुदरा बाजारों में किन्नू 60 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है, जबकि किसानों को प्रति किलोग्राम के 8-10 रुपये मिलते हैं। इस वजह से प्रगतिशील किसानों ने अपनी उपज की सीधा विपणन करना शुरू कर दिया है। पंजाब के होशियारपुर के ऐसे ही एक किसान दीपक पुरी ने बताया कि छोटे किसान भी समूह बनाकर और राज्य सरकार की मदद से कारोबारियों तक सीधे पहुंचकर ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

 

सहोटा ने बताया कि पंजाब सरकार उपभोक्ताओं की जागरूकता के लिए एक अभियान शुरू करने के बारे में विचार कर रही है। उन्होंने कहा, 'हमने इस साल दिसंबर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये लक्षित ग्राहकों तक पहुंच बनाने की योजना बनाई है। हम उनसे स्वास्थ्य फायदों के लिए ज्यादा किन्नू के सेवन की अपील करेंगे। इससे आखिरकार किसानों को फायदा होगा।' किन्नू की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 'उत्कृष्टता केंद्र' स्थापित किए हैं।

 

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